
सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया, जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की मुख्यपीठ जबलपुर व खंडपीठद्वय इंदौर व ग्वालियर में चार लाख 80 हजार से अधिक लंबित प्रकरणों का बोझ एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। इन लंबित प्रकरणों में शासकीय सेवकों के पुराने मामलों के अलावा एक के बाद एक दायर होने वाले नए मामले इजाफे का सबब बन रहे हैं।
हाई कोर्ट ने विगत दिनों सर्विस प्रकरणों की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। दरअसल, एक से अधिक याचिकाओं में यह व्यवस्था दी गई, जिसके अंतर्गत राज्य शासन को निर्देश दिया गया है कि शासकीय कर्मचारियों की शिकायतों का निराकरण प्रारंभिक स्तर पर ही सुनिश्चित करने के लिए हर विभाग में प्रभावी शिकायत निवारण मैकेनिज्म बनाया जाए।
यदि विभागों में पर्याप्त अधिकारी उपलब्ध न हों तो सरकार सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीशों की सेवाएं लेकर उन्हें विभिन्न विभागों में नियुक्त कर सकती है। कोर्ट ने अपने आदेश की प्रति राज्य के मुख्य सचिव को भेजने के निर्देश भी दिए हैं, ताकि इस सुझाव पर गंभीरता से विचार हो सके।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में साफ किया है कि ट्रांसफर, वेतनमान, इंक्रीमेंट, प्रमोशन, सीनियरिटी, नियमितीकरण, निलंबन और सेवा समाप्ति जैसे मामलों में कर्मचारी मजबूरी में हाई कोर्ट का रुख कर रहे हैं, जिससे न्यायालयों पर अनावश्यक बोझ बढ़ रहा है। यदि विभागीय स्तर पर ही कर्मचारियों के विवाद सुलझें तो समय, धन और संसाधनों की बचत होगी और इससे कर्मचारियों व सरकार, दोनों को राहत मिलेगी।
हाई कोर्ट बार एसोसिएशन, जबलपुर के अध्यक्ष धन्य कुमार जैन ने चिंता जताते हुए कहा कि अधिकतर सर्विस मैटर की याचिकाएं हाई कोर्ट द्वारा डिस्पोज्ड-ऑफ यानि निर्देश के साथ निराकृत कर दी जाती हैं। इस प्रक्रिया में कमोवेश उसी अधिकारी को नए सिरे से शिकायत दूर करने कहा जाता है, जिसकी हठधर्मिता के कारण शासकीय सेवक को हाई कोर्ट की शरण लेने विवश होना पड़ा था।
विडंबना यह कि अधिसंख्य मामलों में हाई कोर्ट से याचिका निराकृत होने का आदेश संलग्न करने पर भी संबंधित अधिकारी पूर्ववत रवैया अपनाकर परिपालन सुनिश्चित नहीं करते। लिहाजा, विवश होकर अवमानना याचिका दायर करनी पड़ती है। इस तरह हाई कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या में जाहिरतौर पर इजाफा परिलक्षित हो जाता है। यह स्थिति ढाक के तीन पात की कहावत को चरितार्थ करती नजर आ रही है।
हाई कोर्ट में लंबे समय से पैरवी कर रहे अधिवक्ता सचिन पांडे ने बताया कि पिछले दिनों हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति मनिंदर सिंह भट्टी की एकलपीठ ने मध्य प्रदेश में तृतीय व चतुर्थ श्रेणी कर्मियों से सेवानिवृत्ति के बाद रिकवरी निकालने के मामले में महत्वपूर्ण आदेश पारित किया।
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दरअसल, सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद पेंशन अधिकारी नियमित रूप से पीपीओ जारी करते समय वसूली के आदेश पारित करते हैं। हाई कोर्ट ने मुख्य सचिव को आदेश दिया है कि वे सभी जिले के पेंशन अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों से अवगत कराएं। मुख्य सचिव उक्त आदेश का पालन सुनिश्चित कराएं, ताकि भविष्य में अनावश्यक मुकदमेबाजी से बचा जा सके।