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MP हाई कोर्ट ने शेक्सपियर के नाटक का हवाला देकर निरस्त की भरण-पोषण याचिका, कहा- पति से एक पाउंड मांस ऐंठने की कोशिश के अलावा कुछ नहीं

सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि महिला स्वयं नौकरीपेशा है और उसकी आय एक लाख रुपये प्रतिमाह से अधिक है। कोर्ट ने कहा कि भले ही उसकी वर्तमान वार्षिक...और पढ़ें

By Surendra DubeyEdited By: Navodit Saktawat
Publish Date: Tue, 23 Jun 2026 06:44:56 PM (IST)Updated Date: Tue, 23 Jun 2026 06:49:29 PM (IST)
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MP हाई कोर्ट ने शेक्सपियर के नाटक का हवाला देकर निरस्त की भरण-पोषण याचिका, कहा- पति से एक पाउंड मांस ऐंठने की कोशिश के अलावा कुछ नहीं
हाईकोर्ट ने दिया शेक्‍सपियर का हवाला।

HighLights

  1. सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि महिला स्वयं नौकरीपेशा है
  2. वर्तमान में उसकी आय एक लाख रुपये प्रतिमाह से अधिक है।
  3. उसकी वर्तमान वार्षिक आय 14.81 लाख रुपये मानी जाए।

नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ ने अपनी तल्ख टिप्पणी में कहा कि पति से अंतरिम भरण-पोषण की मांग करने वाली महिला का आवेदन शेक्सपियर के प्रसिद्ध नाटक मर्चेंट आफ वेनिस के उस प्रसंग जैसा है, जिसमें एक पाउंड मांस की मांग की गई थी। कोर्ट ने कहा कि प्रस्तुत आवेदन पति से एक पाउंड मांस ऐंठने की कोशिश के अलावा कुछ नहीं है, जिसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।

कोर्ट एक महिला द्वारा फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी। दरअसल, फैमिली कोर्ट ने तलाक की लंबित कार्यवाही के दौरान अंतरिम भरण-पोषण और मुकदमे के खर्च की मांग खारिज कर दी थी। महिला ने दावा किया था कि उसकी आय कम हो गई है, इसलिए उसे आर्थिक सहायता दी जाए।


सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पाया कि महिला स्वयं नौकरीपेशा है और उसकी आय एक लाख रुपये प्रतिमाह से अधिक है। कोर्ट ने कहा कि भले ही उसकी वर्तमान वार्षिक आय 14.81 लाख रुपये मानी जाए, तब भी वह लगभग 1.25 लाख रुपये प्रतिमाह अर्जित कर रही है और अपना भरण-पोषण करने में पूरी तरह सक्षम है।

कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि दंपती की कोई संतान नहीं है तथा पति-पत्नी की आय में ऐसा कोई बड़ा अंतर नहीं है, जिससे आर्थिक निर्भरता का मामला बनता हो।

कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण का उद्देश्य जरूरतमंद जीवनसाथी को सहायता देना है, न कि समान आर्थिक स्थिति वाले पक्ष को अतिरिक्त लाभ पहुंचाना। इन टिप्पणियों के साथ हाई कोर्ट ने महिला की याचिका निरस्त करते हुए फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।