'महिला का फोटो खींचना अपराध नहीं', MP हाईकोर्ट ने एडवोकेट पर दर्ज FIR निरस्त की
MP हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में निजता और आपराधिक मंशा के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया है। जबलपुर सिंगल बेंच ने यह साफ किया कि बिना किसी आपत्तिज ...और पढ़ें
Publish Date: Fri, 30 Jan 2026 01:25:00 AM (IST)Updated Date: Fri, 30 Jan 2026 01:25:42 AM (IST)
अधिवक्ता द्वारा महिला की फोटो खींचना कोई अपराध नहीं: MP हाईकोर्ट (AI Generated Image)HighLights
- हाईकोर्ट ने फोटो खींचने को अपराध नहीं माना
- पांच महीने बाद दर्ज एफआईआर पर सवाल
- महिला की गरिमा ठेस का इरादा साबित नहीं
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर खंडपीठ के न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल किसी महिला की फोटो खींचना अपने आप में अपराध नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि जब तक महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने का स्पष्ट इरादा साबित न हो, तब तक आपराधिक दायित्व नहीं बनता।
अधिवक्ता को मिली राहत, FIR निरस्त
यह आदेश रीवा निवासी अधिवक्ता सुभाष तिवारी की याचिका पर पारित किया गया। उनकी ओर से अधिवक्ता निखिल भट्ट ने पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ रीवा जिले के सोहागी थाना क्षेत्र में एक महिला की शिकायत पर आपराधिक प्रकरण दर्ज किया गया था, जिसे निरस्त करने की मांग की गई।
क्या थे आरोप?
शिकायतकर्ता महिला का आरोप था कि 31 मई, 2024 को वह अपने दोस्तों के साथ बाजार में जूस पी रही थी। इसी दौरान अधिवक्ता सुभाष तिवारी ने उसकी फोटो खींच ली और बदनाम करने की धमकी दी। हालांकि, इस घटना के करीब पांच महीने बाद 17 अक्टूबर को एफआईआर दर्ज कराई गई।
देरी और पेशेगत शत्रुता पर कोर्ट की टिप्पणी
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि शिकायतकर्ता महिला के दादा से जुड़े एक मामले में अधिवक्ता सुभाष तिवारी विपक्षी पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे हैं। इसी पेशेगत शत्रुता और व्यक्तिगत प्रतिशोध के कारण यह एफआईआर दर्ज करवाई गई। कोर्ट ने एफआईआर में हुई असामान्य देरी को भी गंभीरता से लिया।
इरादे की भूमिका पर स्पष्टता
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि किसी महिला की इज्जत को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से शब्द, इशारा, आवाज या कोई वस्तु प्रदर्शित की जाती है, तभी भारतीय दंड संहिता के तहत अपराध बनता है। ऐसे मामलों में तीन साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। लेकिन इस प्रकरण में ऐसा कोई तत्व सामने नहीं आया।
अंतिम आदेश
इन तथ्यों के आधार पर हाई कोर्ट ने अधिवक्ता सुभाष तिवारी के खिलाफ दर्ज आपराधिक प्रकरण को निरस्त करते हुए उन्हें राहत प्रदान की।