MP हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, अगर कर्मचारी काम करने का इच्छुक है, तो 'नो वर्क नो पे' का नियम लागू नहीं होगा
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश की युगलपीठ ने अपने एक आदेश में साफ किया कि यदि कर्मचारी कार्य करने का इच्छुक है, तो ऐसी स्थिति में नो वर् ...और पढ़ें
Publish Date: Fri, 06 Mar 2026 10:33:30 PM (IST)Updated Date: Sat, 07 Mar 2026 05:16:09 AM (IST)
MP हाई कोर्ट का बड़ा फैसला।HighLights
- हाई कोर्ट से वन रक्षकों को बड़ी राहत
- बैक वेज और सेवा लाभ देने का आदेश
- एमपी HC एकलपीठ का फैसला निरस्त
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश विवेक रूसिया व न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने अपने एक आदेश में साफ किया कि यदि कर्मचारी कार्य करने का इच्छुक है, तो ऐसी स्थिति में नो वर्क नो पे का सिद्धांत लागू नहीं होता है। कोर्ट ने इस व्यवस्था के साथ एकलपीठ के आदेश को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ताओं को बैक वेज सहित सेवा संबंधित अन्य लाभ प्रदान करने का राहतकारी आदेश दिया है।
दैनिक वेतन भोगी से स्थायी नियुक्ति तक का सफर
याचिकाकर्ता रीवा निवासी फारेस्ट गार्ड राजेश कुमार पांडे सहित अन्य की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि वन विभाग में साल 1980 में उनकी नियुक्ति दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के पद पर हुई थी। उन्होंने 20 साल से अधिक सेवा की थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर राज्य शासन ने उपयुक्त दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों को फारेस्ट गार्ड पर स्थायी रूप से नियुक्ति करने का फैसला लिया था।
भर्ती प्रक्रिया और नियुक्ति आदेश में देरी
चीफ कंजर्वेटर ऑफ फारेस्ट ने सितंबर, 2008 को फारेस्ट गार्ड के 1500 खाली पदों को नोटिफाई किया था। जिनमें से 1006 पद जरूरी योग्यता पूरी करने के बाद भरे जाने थे। अपीलकर्ताओं ने नोटिफिकेशन के अनुसार आवेदन किया था और लिखित परीक्षा, इंटरव्यू और फिजिकल टेस्ट में सफल रहे। अपीलकर्ताओं को वेरिफिकेशन के लिए अपने टेस्टिमोनियल जमा करने का निर्देश देने के बावजूद नियुक्ति आदेश जारी नहीं किए गए।
नियुक्ति निरस्तीकरण और कानूनी लड़ाई
अपीलकर्ताओं को अगस्त 2010 में नियुक्ति पत्र जारी किए गए और फिजिकली और मेडिकली फिट घोषित होने के बाद उन्होंने ड्यूटी ज्वॉइन कर ली। एक माह बाद सितंबर 2010 में उनकी नियुक्ति निरस्त कर दी। जिसके खिलाफ उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट ने जुलाई 2011 में आदेश जारी किए थे कि नियुक्ति के लिए जिला स्तर मेरिट लिस्ट जारी करना गलत थी।