
नईदुनिया प्रतिनिधि, जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के हालिया दो आदेशों ने स्पष्ट किया है कि संदिग्ध मौत और संवेदनशील आपराधिक मामलों में न्याय केवल अंतिम निष्कर्ष का विषय नहीं है, बल्कि निष्पक्ष जांच और सभी पक्षों को सुनवाई का अवसर देना भी उतना ही आवश्यक है। अदालत ने संकेत दिया है कि जांच की विश्वसनीयता और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से समझौता नहीं किया जा सकता।
टीकमगढ़ के आकाश शुक्ला मौत प्रकरण में न्यायमूर्ति हिमांशु जोशी की एकलपीठ ने फिलहाल सीबीआई जांच का आदेश देने से इनकार किया, लेकिन जांच की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए जिला पुलिस अधीक्षक को सीधे निगरानी की जिम्मेदारी सौंप दी।
याचिकाकर्ता रेखा शुक्ला ने आरोप लगाया है कि पुलिस हिरासत में ले जाए जाने के बाद उनके पुत्र की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भविष्य में जांच की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं तो याचिकाकर्ता पुनः न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकती हैं।
दूसरे मामले में सागर के चर्चित नीलेश आदिवासी मौत प्रकरण में इसी पीठ ने एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट अस्वीकार करने वाले विशेष अदालत के आदेश को निरस्त कर दिया।
अदालत ने कहा कि संबंधित पक्षों को सुनवाई का अवसर दिए बिना पारित आदेश प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।
पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह से जुड़े आरोपों वाले इस मामले में हाईकोर्ट ने पुनर्विचार के लिए प्रकरण वापस भेजते हुए सभी पक्षों को सुनकर नया निर्णय लेने के निर्देश दिए।
दोनों आदेश यह रेखांकित करते हैं कि न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता ही न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी कसौटी है।