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इंदौर में न्याय का महामंथन, लेकिन सवाल वही-मुकदमों के पहाड़ और जजों की कमी का रास्ता कौन काटेगा?

यह तस्वीर केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि न्याय की गति और आम आदमी के भरोसे की तस्वीर है। किसी मुकदमे में फैसला देर से आता है तो उसका असर केवल वादी-प्रतिवा...और पढ़ें

By Surendra DubeyEdited By: Dheeraj kumar Bajpai
Publish Date: Fri, 07 Aug 2026 10:26:08 AM (IST)Updated Date: Fri, 07 Aug 2026 10:26:08 AM (IST)
इंदौर में न्याय का महामंथन, लेकिन सवाल वही-मुकदमों के पहाड़ और जजों की कमी का रास्ता कौन काटेगा?
इंदौर की यह कांफ्रेंस में कहा गया कि एक जज के कंधे पर न्यायिक व्यवस्था का कितना बोझ डाला जा सकता है?

HighLights

  1. न्यायपालिका को केवल आधुनिक नहीं, पर्याप्त भी बनाना होगा।
  2. कांफ्रेंस से निकलने वाला सबसे बड़ा संदेश शायद यही होना चाहिए
  3. प्रतीक्षा केवल वर्षों की नहीं, बल्कि एक पीढ़ी की उम्र पार कर चुकी है।

सुरेन्द्र दुबे, नईदुनिया जबलपुर। मध्य प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था के लिए यह महज एक कांफ्रेंस नहीं है। आठ और नौ अगस्त को इंदौर में सुप्रीम कोर्ट और देश के विभिन्न हाई कोर्ट के 50 से अधिक न्यायमूर्तियों का जमावड़ा हो रहा है।

जाहिर तौर पर यह न्याय व्यवस्था की चुनौतियों, न्यायिक सुधार और भविष्य की रणनीति पर गंभीर मंथन का अवसर है। लेकिन इस महामंथन के बीच मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के सामने खड़ा एक सवाल इतना बड़ा है कि उसे नजरअंदाज करना मुश्किल है-क्या केवल न्यायिक चिंतन से न्याय का पहाड़ छोटा होगा या इसके लिए अदालतों को पर्याप्त संख्या में जज भी मिलेंगे?


दरअसल, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के सामने लंबित मुकदमों का आंकड़ा अब करीब 4.90 लाख तक पहुंच चुका है। 16 जुलाई 2026 के उपलब्ध आंकड़ों में हाई कोर्ट देश के सर्वाधिक लंबित मामलों वाले न्यायालयों में शामिल है। इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि इनमें 24,938 मामले 20 वर्ष से अधिक पुराने हैं। यानी हजारों मुकदमे ऐसे हैं जिनमें न्याय की प्रतीक्षा केवल वर्षों की नहीं, बल्कि एक पीढ़ी की उम्र पार कर चुकी है।

देर से मिला न्याय कई बार न्याय की उपयोगिता को ही कमजोर कर देता है

संपत्ति विवाद में परिवारों की पीढ़ियां उलझती हैं, सेवा विवाद में कर्मचारी सेवानिवृत्त हो जाते हैं, आपराधिक मामलों में आरोपित और पीड़ित दोनों वर्षों तक तारीखों के बीच झूलते रहते हैं। देर से मिला न्याय कई बार न्याय की उपयोगिता को ही कमजोर कर देता है।

समानांतर जजों की संख्या का सवाल महत्वपूर्ण

इसके समानांतर जजों की संख्या का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में 53 न्यायाधीश पद स्वीकृत हैं। 2026 में उपलब्ध सरकारी आंकड़ों पर आधारित रिपोर्ट के अनुसार करीब 42 न्यायाधीश कार्यरत थे, यानी लगभग 11 पद खाली-लगभग पांचवां हिस्सा।

जटिल मामलों पर गहन सुनवाई करे

विडंबना यह है कि अदालत से अपेक्षा है कि वह लंबित मामलों का बोझ घटाए, नए मामलों की बाढ़ संभाले, पुराने मुकदमों को प्राथमिकता दे, संवैधानिक और जटिल मामलों पर गहन सुनवाई करे और हर पक्ष को पर्याप्त सुनवाई का अवसर भी दे। लेकिन जब न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या ही पूरी नहीं है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक जज के कंधे पर न्यायिक व्यवस्था का कितना बोझ डाला जा सकता है?

ई-फाइलिंग और डिजिटल तकनीक प्रक्रिया को तेज कर सकती है

इंदौर की यह कांफ्रेंस इसलिए ऐतिहासिक हो सकती है, यदि चर्चा केवल तकनीक, एआई, ई-कोर्ट, केस मैनेजमेंट और न्यायिक सुधारों तक सीमित न रहे, बल्कि जज बनाम लंबित मुकदमे के वास्तविक अनुपात पर भी खुले मन से विचार करे। ई-फाइलिंग और डिजिटल तकनीक प्रक्रिया को तेज कर सकती है, लेकिन अंतिम न्यायिक निर्णय के लिए प्रशिक्षित और पर्याप्त संख्या में न्यायाधीश चाहिए।

सवाल यह भी है

  • क्या हर स्वीकृत पद को समयबद्ध तरीके से भरने की व्यवस्था बनाई जा सकती है?
  • पुराने मुकदमों के लिए विशेष रणनीति, समयबद्ध सुनवाई व प्रभावी केस मैनेजमेंट लागू किया जा सकता है?
  • क्या ऐसे मामलों की अलग निगरानी हो सकती है जो 10, 20 या उससे अधिक वर्षों से लंबित हैं?

न्याय करने वाले हाथ कम पड़ जाएं, तो कतार लंबी होगी

इस कांफ्रेंस से निकलने वाला सबसे बड़ा संदेश शायद यही होना चाहिए। न्यायपालिका को केवल आधुनिक नहीं, पर्याप्त भी बनाना होगा। क्योंकि अदालत की इमारत कितनी भी भव्य हो, तकनीक कितनी भी आधुनिक हो और कानून कितना भी उत्कृष्ट-यदि न्याय करने वाले हाथ कम पड़ जाएं, तो न्याय की कतार लंबी होती चली जाएगी।

न्यायाधीशों की कमी और न्याय की बढ़ती अपेक्षाएं एक साथ खड़ी हैं

इंदौर में देश के शीर्ष न्यायमूर्तियों का मंथन ऐसे समय हो रहा है जब न्याय व्यवस्था के सामने मुकदमों का पहाड़, न्यायाधीशों की कमी और न्याय की बढ़ती अपेक्षाएं एक साथ खड़ी हैं। बहरहाल, इंदौर में मंथन हो रहा है। अब देश और प्रदेश की निगाहें इस पर रहेंगी कि इस मंथन से मुकदमों के पहाड़ को काटने की ठोस कार्ययोजना निकलती है या नहीं।

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