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MP में कलचुरी काल का 'वाटर मैनेजमेंट' आज भी बना है बेमिसाल, अकाल में भी नहीं सूखती थीं बावड़‍ियां

शहडोल संभाग की 8वीं से 12वीं शताब्दी की कलचुरी कालीन सीढ़ीदार बावड़ियां आज भी जल प्रबंधन का बेमिसाल उदाहरण हैं।

By Ravindra VaidyaEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Sat, 06 Jun 2026 01:19:35 PM (IST)Updated Date: Sat, 06 Jun 2026 01:28:15 PM (IST)
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MP में कलचुरी काल का 'वाटर मैनेजमेंट' आज भी बना है बेमिसाल, अकाल में भी नहीं सूखती थीं बावड़‍ियां
ऐतिहासिक बावड़ी जिसका पानी कभी नहीं सूखता।

HighLights

  1. कलचुरी 8वीं से 12वीं शताब्दी, गोंडवाना 15वीं से 18वीं शताब्दी में झिरिया पर बावड़ी निर्माण हुआ
  2. गहरी संकरी डिजाइन, सूर्य की सीधी रोशनी नहीं पहुंचती, पानी ठंडा रहता है और अकाल में भी सूखती नहीं
  3. सीढ़ियां विशेष कोण पर, ढोला सपोर्ट से प्रवाह निरंतर, आज के जल संकट में इंजीनियरिंग सबक

रविन्द्र वैद्य, नईदुनिया, शहडोल। प्राचीन काल में राजा-महाराजाओं की दूरगामी सोच और जल संरक्षण के प्रति उनकी संवेदनशीलता का प्रत्यक्ष उदाहरण आज भी शहडोल संभाग में देखने को मिलता है। ऐतिहासिक रूप से 'विराटनगर' के नाम से प्रसिद्ध इस क्षेत्र में 8वीं से 12वीं शताब्दी के कलचुरी शासन काल और इसके बाद 15वीं से 18वीं शताब्दी के गोंडवाना शासन काल में निर्मित की गई सीढ़ीदार बावड़ियां न केवल स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना हैं, बल्कि जल प्रबंधन के मामले में आज के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी मात देती हैं।

प्राचीन काल में राजाओं द्वारा धार्मिक स्थलों के साथ बावड़ियों का निर्माण कराने के पीछे मुख्य उद्देश्य पूजा-पाठ के लिए निरंतर जल की उपलब्धता और राहगीरों व जरूरतमंदों को पेयजल मुहैया कराना था। 'सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय' के इस संकल्प को पूरा करने के लिए हमेशा ऐसे स्थानों का चुनाव होता था, जहां प्राकृतिक रूप से जल स्रोत (झिरिया) मौजूद हों।


बाणगंगा कुंड और विराटेश्वर मंदिर

संभागीय मुख्यालय के बाणगंगा कुंड के साथ-साथ प्रसिद्ध विराटेश्वर भोलेनाथ मंदिर के ठीक सामने 10वीं शताब्दी की कलचुरी कालीन गहरी सीढ़ीदार बावड़ी स्थित है।

सोहागपुर गढ़ी की 'अंडरग्राउंड' बावड़ी

सोहागपुर स्थित गढ़ी में एक बेहद अनूठी बावड़ी है, जो बाहर से दिखाई नहीं देती। इसमें सीढ़ियों के सहारे जमीन के अंदर प्रवेश करने पर एक विहंगम जल स्रोत नजर आता है।

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आईटीआई गणेश मंदिर

आईटीआई कॉलेज के समीप स्थित ऐतिहासिक कलचुरी कालीन गणेश मंदिर परिसर में भी एक गहरी सीढ़ीनुमा बावड़ी आज भी जीवंत है।

अंतरा का कंकाली माता मंदिर

ऐतिहासिक अंतरा मंदिर परिसर, जहां मां कंकाली की कलचुरी कालीन प्रतिमा स्थापित है, दक्षिणी भाग में प्राचीन मंदिरों के अवशेषों के बीच एक चमत्कारी बावड़ी स्थित है, जिसके इतिहास से कई अद्भुत कहानियां जुड़ी हैं। क्षेत्र में जो बावड़ियां बनाई जाती थीं, उनकी खास बात यह थी कि ये नीचे सीधे प्राकृतिक जल स्रोत तक जाती थीं।

सूर्य की सीधी रोशनी नहीं पड़ती

पुरातत्व संग्रहालय के पूर्व मार्गदर्शक रामनाथ परमार बताते हैं कि ये प्राकृतिक जल स्रोत तकनीकी रूप से इतने सुदृढ़ थे कि चाहे कितना भी भीषण अकाल पड़े, ये बावड़ियां कभी सूखती नहीं थीं और सबकी प्यास बुझाती थीं। खेतों के बीच बने कुछ कुंडों में लकड़ी के बड़े-बड़े 'ढोला' (सपोर्ट) लगाए जाते थे, जिससे जल का प्रवाह निरंतर बना रहता था।

पानी का ज्यादा वाष्पीकरण ना हो, इसलिए इन्हें गहरा और संकरा डिजाइन किया जाता था ताकि सूर्य की सीधी रोशनी पानी पर न पड़े। इससे पानी हमेशा ठंडा और सुरक्षित रहता था। जलस्तर घटने पर भी लोग आसानी से पानी तक पहुंच सकें, इसके लिए सीढ़ियों का निर्माण विशेष कोण पर किया जाता था।

आज के इस आधुनिक दौर में, जब जल संकट एक बड़ी चुनौती बना हुआ है, शहडोल की ये ऐतिहासिक बावड़ियां हमारे पूर्वजों के बेजोड़ जल प्रबंधन और इंजीनियरिंग का जीता-जागता प्रमाण हैं।

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