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उज्जैन-गरोठ फोरलेन प्रोजेक्ट : रेलवे ओवर ब्रिज की रिटेनिंग वॉल 6 महीने में दूसरी बार ढही, फिर हुई चूक पर उठे सवाल

Ujjain Garoth Four Lane Project: सबसे बड़ा सवाल यही है- जब पहली घटना के बाद उसी हिस्से को दोबारा बनाया गया था, तो दो महीने में फिर समस्या क्यों आई।

By Digital DeskEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Tue, 01 Sep 2026 09:39:20 AM (IST)Updated Date: Tue, 01 Sep 2026 09:57:49 AM (IST)
उज्जैन-गरोठ फोरलेन प्रोजेक्ट : रेलवे ओवर ब्रिज की रिटेनिंग वॉल 6 महीने में दूसरी बार ढही, फिर हुई चूक पर उठे सवाल
लोकार्पण से पहले दोबारा ढहा प्रेमनगर स्थित उज्जैन-गरोठ रोड पर बना रेलवे ओवर ब्रिज।

HighLights

  1. 13 फरवरी 2026 को प्रेमनगर आरओबी की एप्रोच में लैंड सब्सिडेंस हुआ था
  2. तैयार सरफेस बैठ गई और रिटेनिंग वॉल का हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया
  3. करीब चार महीने में नई वॉल तैयार हुई, इसे पहली समस्या का समाधान माना गया

नईदुनिया प्रतिनिधि, उज्जैन। उज्जैन-गरोठ फोरलेन परियोजना अंतर्गत प्रेमनगर में बने रेलवे ओवर ब्रिज (आरओबी) की रिटेनिंग वॉल का छह महीने में दूसरी बार खिसककर टूटना अब सामान्य तकनीकी खामी कहकर टालने वाला मामला नहीं रहा। घटनाक्रम की कड़ी खुद कई सवाल खड़े कर रही है। 13 फरवरी को एप्रोच धंसी, रिटेनिंग वॉल क्षतिग्रस्त हुई। कार्रवाई हुई, ठेकेदार का भुगतान रोका गया और प्रभावित हिस्सा दोबारा बनाने के निर्देश दिए गए।

जून में नई वॉल तैयार भी हो गई। लेकिन अगस्त में उसी वॉल में फिर डिस्प्लेसमेंट सामने आ गया और ब्लाक की बनी दीवार तथा उसमें भरा मटेरियल ढहने लगा। नतीजा- भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी एनएचएआइ के निर्देश पर ठेकेदार स्वयं के 10 करोड़ रुपये खर्च कर अब करीब 500 मीटर हिस्सा फिर तोड़कर बनाएगा।


सबसे बड़ा सवाल यही है- जब पहली घटना के बाद उसी हिस्से को दोबारा बनाया गया था, तो दो महीने में फिर समस्या क्यों आई। क्या पहली गड़बड़ी का मूल कारण पहचाना गया था। अगर पहचाना गया था तो उसे पूरी तरह दूर किया गया या नहीं। और जून में तैयार हुई वॉल को गुणवत्ता की कसौटी पर किस प्रक्रिया से सही माना गया।

एक जगह, दो बार खामी

13 फरवरी 2026 को प्रेमनगर आरओबी की एप्रोच में लैंड सब्सिडेंस हुआ था। तैयार सरफेस बैठ गई और रिटेनिंग वॉल का हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया। इसके बाद एनएचएआइ ने ठेकेदार फर्म जीएचवी के भुगतान पर रोक लगाई और प्रभावित हिस्से के री-कंस्ट्रक्शन के निर्देश दिए।

करीब चार महीने में नई वॉल तैयार हुई। इसे पहली समस्या का समाधान माना गया। लेकिन अगस्त में आरइ वॉल के ब्लॉक्स में फिर डिस्प्लेसमेंट दिखाई दिया। यहीं से मामला गंभीर हो जाता है। पहली बार क्षति के बाद जो हिस्सा दोबारा बनाया गया, उसी में दोबारा खामी सामने आई है।

जून में ठीक था तो अगस्त में कैसे खिसका

इस सवाल का जवाब अब केवल यह बताकर नहीं दिया जा सकता कि प्रभावित हिस्सा फिर बना दिया जाएगा। तकनीकी जांच में स्पष्ट होना चाहिए कि फाउंडेशन और बेस की तैयारी निर्धारित डिजाइन के अनुसार हुई थी या नहीं। बैकफिलिंग में निर्धारित सामग्री और पर्याप्त कम्पैक्शन हुआ था या नहीं। पानी की निकासी के लिए ड्रेनेज व्यवस्था पर्याप्त थी या नहीं।

आरई वॉल के ब्लॉक्स की इंस्टॉलेशन और कनेक्शन तकनीकी मानकों के अनुसार हुए या नहीं। फरवरी की घटना के बाद किए गए री-कंस्ट्रक्शन की गुणवत्ता जांच किस स्तर पर हुई थी। क्योंकि यदि पहली घटना का मूल कारण दूर किए बिना केवल क्षतिग्रस्त हिस्सा दोबारा बनाया गया, तो दूसरी बार की समस्या उसी कमी का परिणाम हो सकती है। और यदि मूल कारण दूर किया गया था, तो फिर नए निर्माण में खामी कहां आई—यह भी सामने आना चाहिए।

आईआईटी दिल्ली की जांच अब सबसे अहम कड़ी

एनएचएआई ने 22 अगस्त को आइआइटी दिल्ली के विशेषज्ञों से साइट का तकनीकी निरीक्षण कराया। विशेषज्ञों की सलाह के बाद प्रभावित करीब 500 मीटर हिस्से को हटाकर दोबारा बनाने का निर्णय लिया गया। यह निर्णय महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है तकनीकी रिपोर्ट में सामने आने वाला मूल कारण।

क्या समस्या फाउंडेशन में है। क्या बैकफिलिंग या कम्पैक्शन में कमी रही? क्या ड्रेनेज प्रभावित हुआ? या आरई वॉल के निर्माण में कोई तकनीकी विचलन हुआ। जब तक कारण सामने नहीं आएगा, तीसरी बार निर्माण भी केवल एक और री-कंस्ट्रक्शन बनकर रह जाएगा।

‘ठेकेदार अपने खर्च पर बनाएगा’ से मामला खत्म नहीं

एनएचएआई के अनुसार प्रभावित हिस्सा कन्सेशनायर अपने खर्च पर डिस्मेंटल कर दोबारा बनाएगा। इससे दोबारा निर्माण का खर्च ठेकेदार पक्ष पर जाएगा। लेकिन सवाल आर्थिक नुकसान का ही नहीं, गुणवत्ता की निगरानी का भी है। निर्माण के दौरान तकनीकी निरीक्षण किस स्तर पर हुआ? सामग्री की जांच किसने की। कम्पैक्शन की पुष्टि कैसे हुई। जून में तैयार वॉल को किस जांच के बाद स्वीकार किया गया? पहली घटना के बाद कराए गए री-कंस्ट्रक्शन की गुणवत्ता का सत्यापन किसने किया।

सबसे बड़ा सवाल

छह महीने में एक ही आरओबी की दीवार दो बार जवाब दे चुकी है। अब तीसरी बार सिर्फ 500 मीटर दीवार नहीं बननी चाहिए—पहली दो बार हुई चूक का पूरा हिसाब भी सामने आना चाहिए। क्योंकि असली गुणवत्ता की परीक्षा दीवार टूटने के बाद नहीं, उसे पहली बार सही बनाने और सही मानने की प्रक्रिया में होती है।

यह भी पढ़ें- पितृ पर्वत से उज्जैन बायपास तक नया फोरलेन, सिंहस्थ से पहले तैयार होगी इंदौर-उज्जैन की हाई-स्पीड कनेक्टिविटी

प्रभावित हिस्से हटाकर दोबारा बनाने का निर्णय

तकनीकी विशेषज्ञों के निरीक्षण के बाद प्रभावित हिस्से को हटाकर दोबारा बनाने का निर्णय लिया है। कार्य कन्सेशनायर अपने खर्च पर करेगा और गुणवत्ता मानकों का पूरा पालन सुनिश्चित किया जाएगा। - शिवम शर्मा, प्रोजेक्ट डायरेक्टर, एनएचएआई