
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और सुरक्षा पर नजर रखने वाली स्वास्थ्य एजेंसी FSSAI की ओर से डाबर को अपने कुछ उत्पादों, जैसे डाबर हनी, के लिए ‘100% शुद्ध’ या ‘100 फीसदी नेचुरल’ जैसे दावों से बचने की सलाह दी गई है।
इस घटनाक्रम के बाद करीब 140 साल पुरानी डाबर कंपनी एक बार फिर चर्चा में है। हालांकि, डाबर का इतिहास सिर्फ अपने मौजूदा उत्पादों तक सीमित नहीं है। इसकी शुरुआत उस दौर में हुई थी, जब एक डॉक्टर साइकिल से गांव-गांव जाकर आयुर्वेदिक दवाएं बेचते थे।
डाबर की कहानी अंग्रेजी हुकूमत के दौर में करीब 1884 से जुड़ी है। उस समय देश में हैजा, मलेरिया, प्लेग और कालरा जैसी महामारियों का प्रकोप था। अस्पतालों की संख्या कम थी और दवाओं की उपलब्धता भी बड़ी चुनौती थी।
इसी दौर में कोलकाता के आयुर्वेदिक डॉक्टर एसके बर्मन ने जड़ी-बूटियों पर शोध किया। इसके बाद वह साइकिल से गांव-गांव और घर-घर जाकर मरीजों को कम कीमत पर आयुर्वेदिक दवाएं उपलब्ध कराने लगे। धीरे-धीरे ग्रामीणों के बीच उनकी दवाओं और इलाज को लेकर भरोसा बढ़ा। इसी भरोसे ने उन्हें आयुर्वेदिक दवा कंपनी शुरू करने के लिए प्रेरित किया।
बंगाल में लोग डॉ. बर्मन को प्यार से ‘डाकतार’ यानी डॉक्टर कहते थे। कंपनी का नाम तय करते समय ‘डाकतार’ यानी Daktar और Burman को मिलाकर ‘Dabur’ नाम चुना गया। गांवों से शुरू हुआ यह नाम धीरे-धीरे शहरों तक पहुंचा और डाबर की पहचान मजबूत होती गई।
डाबर के विस्तार में 1919 से 1940 के बीच का दौर महत्वपूर्ण रहा। आयुर्वेदिक दवाओं की मांग बढ़ने लगी तो केवल हाथों से उत्पादन करके जरूरत पूरी करना मुश्किल होने लगा। वर्ष 1919 में डॉ. बर्मन के बेटे सीएल बर्मन ने फैक्ट्री और लैब की स्थापना की।
सीएल बर्मन ने आयुर्वेदिक फार्मूलों की शुद्धता बनाए रखने के लिए उत्पादन प्रक्रिया में स्वचालित मशीनों के इस्तेमाल पर जोर दिया। इससे कंपनी के उत्पादन को बड़े स्तर पर बढ़ाने में मदद मिली।
डाबर ने केवल आयुर्वेदिक दवाओं तक खुद को सीमित नहीं रखा। 1940 के दशक में कंपनी ने डाबर आंवला हेयर ऑयल लॉन्च किया। इसके साथ कंपनी का कारोबार स्वास्थ्य से जुड़े उत्पादों के अलावा सौंदर्य उत्पादों की दिशा में भी बढ़ने लगा।
समय के साथ बंगाल में राजनीतिक उथल-पुथल, मजदूरों की हड़ताल और नक्सलवादी आंदोलन का असर कारोबार पर भी दिखाई देने लगा। ऐसे माहौल में डाबर और बिड़ला समेत कई कारोबारी घरानों ने अपने कारोबार को बंगाल से बाहर ले जाने का फैसला किया।
बर्मन परिवार ने वर्ष 1972 में डाबर का हेड ऑफिस कोलकाता से नई दिल्ली स्थानांतरित करने का निर्णय लिया। दिल्ली आने के बाद कंपनी को उत्तर भारत के बाजार में विस्तार का अवसर मिला। यूपी, पंजाब और हरियाणा समेत आसपास के क्षेत्रों में डाबर की पहुंच तेजी से बढ़ी।
1980 के दशक में डाबर ने खुद को आयुर्वेदिक दवा कंपनी से आगे बढ़ाकर FMCG ब्रांड के रूप में स्थापित करना शुरू किया। डाबर च्यवनप्राश, टूथपेस्ट, पुदीन हरा, डाबर लाल तेल और डाबर हनी जैसे उत्पाद घर-घर में पहचान बनाने लगे। इसी दौरान काला नमक, जीरा और जड़ी-बूटियों से तैयार हाजमोला भी लोकप्रिय हुआ। कंपनी ने भारतीय बाजार में अपनी स्थिति मजबूत करने के साथ विदेशों में भी विस्तार किया।
भारत में मजबूत पकड़ बनाने के बाद डाबर ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों का रुख किया। कंपनी ने खाड़ी देशों, अफ्रीका, दक्षिण एशिया, यूरोप और अमेरिका में अपना कारोबार फैलाया। इस तरह करीब 140 साल पहले साइकिल से गांव-गांव जाकर आयुर्वेदिक दवा बेचने से शुरू हुआ डाबर का सफर समय के साथ एक बड़े FMCG ब्रांड में बदल गया। एसके बर्मन की छोटी शुरुआत से लेकर सीएल बर्मन की फैक्ट्री और लैब की स्थापना तथा बाद में दिल्ली स्थानांतरण और FMCG विस्तार तक, डाबर की कहानी भारतीय कारोबारी इतिहास में एक उल्लेखनीय सफर रही है।