
डिजिटल डेस्क। बिहार के बांका जिले के धोरैया प्रखंड में मुहर्रम का त्योहार केवल एक समुदाय विशेष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की साझी संस्कृति और गंगा-जुमनी तहजीब का एक जीवंत प्रतीक बन चुका है। शनिवार की शाम 'केला कट्टी' रस्म के साथ यहां मुहर्रम के आयोजनों की शुरुआत हो गई, जिससे पूरा इलाका तासे की गूंज और मातम के सुरों से सराबोर है। इस सिलसिले का समापन आगामी 26 जून को निशानों के विसर्जन (पहलाम) के साथ होगा।
कर्बला की ऐतिहासिक जंग में इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाए जाने वाले इस मातमी त्योहार में धोरैया के कई हिंदू परिवार न सिर्फ शामिल होते हैं, बल्कि पीढ़ियों पुरानी परंपराओं का नेतृत्व भी करते हैं।
प्रखंड की भेलाय पंचायत के तिलौन्धा गांव में रहने वाले 16 हिंदू परिवार पिछले लगभग 150 वर्षों से मुहर्रम का त्योहार पूरी शिद्दत से मना रहे हैं। इस अनोखी परंपरा की नींव गांव के ही बुजुर्ग भगलु जमेदार ने रखी थी। उनके वंशज सोतो चौहान ने इस इतिहास पर रोशनी डालते हुए बताया कि दशकों पहले उनके पूर्वज पास के बसतपुर गांव में स्थित पीर बाबा के स्थान पर मन्नत मांगने और प्रसाद चढ़ाने जाया करते थे।
एक बार वहां प्रसाद (खीर) बनाते समय चूल्हे की आग बुझ गई। भगलु जमेदार की बहू ने जब फूंक मारकर आग को दोबारा जलाने की कोशिश की, तो अचानक भड़की लपटों से उनका चेहरा गंभीर रूप से झुलस गया। इस हादसे से घबराए परिजनों ने पीर बाबा से महिला के सकुशल ठीक होने की दुआ मांगी और मन्नत रखी कि स्वस्थ होने पर वे हर साल निशान के साथ मुहर्रम मनाएंगे।
पीर बाबा की कृपा और मजार के नीर (पवित्र जल) के प्रभाव से महिला पूरी तरह ठीक हो गई। इसके बाद भगलु जमेदार ने अपने गांव में ही पीर बाबा का मजार स्थापित किया। तब से लेकर आज तक सोतो चौहान, मोहन चौहान, गया चौहान, बुललो चौहान और अर्जुन चौहान समेत सभी 16 परिवार मिलकर इस परंपरा को निभा रहे हैं।
समय के साथ सुरक्षा और स्थानीय विवादों के कारण इस परंपरा के स्वरूप में थोड़े बदलाव जरूर आए हैं। पहले ये परिवार अपने निशानों को लेकर पड़ोसी थाना क्षेत्र बाराहाट के सिदान, कैतका और श्रीपुर मजारों तक मिलान के लिए जाते थे, लेकिन अब वे विवादों से बचने के लिए गांव की सीमाओं के भीतर ही जुलूस निकालते हैं और स्थानीय भेलाय बांध में सम्मानपूर्वक निशान का पहलाम करते हैं।
सांप्रदायिक भाईचारे की एक और खूबसूरत कहानी धोरैया के ही करहरिया गांव में देखने को मिलती है, जहां मुहर्रम के मुख्य आकर्षण 'ताजिया' का निर्माण एक हिंदू मूर्तिकार द्वारा किया जाता है। झारखंड के गोड्डा जिले (बसंतराय थाना) के अंतर्गत आने वाले बिश्वासखानी गांव के निवासी मंटू मालाकार पिछले 18 वर्षों से यहां आकर ताजिया बनाने का काम कर रहे हैं।
मंटू मालाकार बताते हैं कि उनका परिवार पिछले 100 से अधिक वर्षों से इस कला से जुड़ा हुआ है और वे अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी हैं। इस काम की शुरुआत उनके दादा सुंदर मालाकार ने की थी, जिसे बाद में उनके पिता विश्वनाथ मालाकार और दुर्गा मालाकार ने आगे बढ़ाया।
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मुहर्रम उत्सव से ठीक एक सप्ताह पहले ताजिया बनाने का काम बेहद कड़े नियमों और शुद्धता के साथ शुरू होता है, जो नवमी की रात तक पूरी तरह मुकम्मल हो जाता है। बांका के धोरैया का यह इलाका आज के दौर में भी समाज को यह संदेश दे रहा है कि आस्था और इंसानियत की जड़ें किसी भी मजहबी दीवार से कहीं ज्यादा गहरी होती हैं।