
डिजिटल डेस्क। श्रद्धा, आस्था और विभिन्नताओं से सराबोर भारत में पूजा-पद्धतियों के कई अनूठे रंग देखने को मिलते हैं। जहां आमतौर पर सनातन परंपरा में देवी-देवताओं की आराधना की जाती है, वहीं देश में कुछ ऐसे भी कौतूहल जगाने वाले स्थान हैं, जहां देवताओं के बजाय दैत्यों (राक्षसों) को पूजा जाता है। ऐसा ही एक अनोखा और हैरान कर देने वाला रिवाज महाराष्ट्र के एक खास गांव में आज भी जीवित है, जहां की मान्यताओं के कारण पूरे क्षेत्र में आपको एक भी हनुमान मंदिर देखने को नहीं मिलेगा।
महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले में पाथर्डी तालुका के अंतर्गत एक गांव आता है, जिसका नाम है नंदूर निम्बा दैत्य। इस गांव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां पवनपुत्र हनुमान जी की पूजा नहीं होती और न ही उनका कोई मंदिर स्थापित है। पौराणिक कथाओं में बजरंगबली को राक्षसों का संहारक माना गया है, यही वजह है कि दैत्य की पूजा करने वाले इस गांव में हनुमान जी की मूर्ति या मंदिर रखना वर्जित माना जाता है।

इस परंपरा का असर यहां के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी साफ दिखता है। इस गांव के निवासी न तो अपने बच्चों का नाम हनुमान जी के नाम पर रखते हैं और न ही कभी 'मारुति' नाम की गाड़ी खरीदते हैं, क्योंकि मारुति को भगवान हनुमान का ही एक स्वरूप माना जाता है।

लोक मान्यताओं के अनुसार, यह पूरी परंपरा भगवान श्रीराम के परम भक्त रहे 'निम्ब दैत्य' और हनुमान जी के बीच हुए एक प्राचीन टकराव से जुड़ी है। कथा कहती है कि राक्षस कुल में जन्म लेने के बावजूद, निम्ब दैत्य भगवान श्रीराम के प्रति अगाध श्रद्धा रखते थे। उनकी कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने उन्हें वरदान दिया था कि वे इस क्षेत्र के ग्राम देवता के रूप में पूजे जाएंगे।
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चूंकि हनुमान जी को लोक परंपराओं में इस व्यवस्था से दूर रखा गया है, इसलिए ग्रामीण एक बेहद अनूठे तरीके से अपने ग्राम देवता की पूजा करते हैं। निम्ब दैत्य को प्रसन्न करने और संकटमोचन हनुमान जी की किसी भी संभावित नाराजगी से बचने के लिए यहां नारियल की बलि (नारियल फोड़ने) की विशेष प्रथा निभाई जाती है।

समय के साथ बदलती दुनिया में भी नंदूर निम्बा दैत्य गांव के लोगों ने अपनी इस सैकड़ों साल पुरानी लोक-कथा और परंपरा को पूरी जीवंतता के साथ सहेज कर रखा है, जो भारतीय संस्कृति के विविध चेहरों को बयां करती है।