
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पटना उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि हिंदू मैरिज एक्ट के तहत किसी शादी को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए सिर्फ मतदाता सूची में नाम होना या गुजारा भत्ता का अदालती आदेश होना ही काफी नहीं है। विवाह को वैध सिद्ध करने के लिए यह साबित करना अनिवार्य होगा कि विवाह सभी आवश्यक धार्मिक रीति-रिवाजों और परंपराओं के साथ संपन्न हुआ था।
अदालत ने कहा कि जिन समाजों में 'सप्तपदी' (सात फेरे) की परंपरा है, वहां विवाह को सिद्ध करने के लिए फेरों का प्रमाण प्रस्तुत करना बेहद जरूरी है। न्यायमूर्ति बिबेक चौधरी और न्यायमूर्ति राणा विक्रम सिंह की संयुक्त पीठ ने दुरगावती देवी नामक महिला द्वारा दायर की गई अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।
उच्च न्यायालय ने सिवान के पारिवारिक न्यायालय (फैमिली कोर्ट) के उस निर्णय को सही ठहराया, जिसमें याचिकाकर्ता महिला को प्रतिवादी सचिता चौधरी की वैध पत्नी स्वीकार करने से मना कर दिया गया था।
मामले के विवरण के अनुसार, दुरगावती देवी का पहला विवाह 22 मई 1990 को सचिता चौधरी के ज्येष्ठ भ्राता सुरेश चौधरी के साथ हुआ था। वर्ष 1997 में सुरेश की मृत्यु हो गई। इसके बाद महिला का दावा था कि पारिवारिक सहमति और दबाव में उसने अपने दिवंगत पति के छोटे भाई सचिता चौधरी से पुनर्विवाह कर लिया और वे पति-पत्नी की तरह रहने लगे। बाद में महिला ने भरण-पोषण (CRPC 125) की अर्जी दाखिल की, जिसके तहत अदालत ने उसे 1000 रुपये प्रति माह देने का आदेश दिया था।
दूसरी ओर, सचिता चौधरी ने इस दूसरे विवाह के दावे को सिरे से खारिज कर दिया। पारिवारिक न्यायालय ने तमाम साक्ष्यों की जांच के बाद 26 फरवरी 2020 को महिला को उनकी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी मानने से इनकार कर दिया था।
उच्च न्यायालय ने साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का गहन विश्लेषण करने के बाद पाया कि अपीलकर्ता महिला अपने कथित दूसरे विवाह की सटीक तिथि, स्थान या उसमें निभाई गई धार्मिक रस्मों का कोई ठोस विवरण नहीं दे सकीं। सुनवाई के दौरान पेश किए गए साक्षी भी यह स्पष्ट करने में विफल रहे कि विवाह किस स्थान पर, किस समय हुआ और कौन-कौन से धार्मिक अनुष्ठान पूरे किए गए।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि बयानों में न तो सिंदूरदान का और न ही सात फेरों का कोई स्पष्ट उल्लेख मिला। इसके अतिरिक्त, विवाह कराने वाले पुरोहित (पंडित) के नाम को लेकर भी गवाहों के कथनों में भारी भिन्नता पाई गई।
खंडपीठ ने अपने फैसले में रेखांकित किया कि वोटर लिस्ट में किसी व्यक्ति के नाम के आगे महिला को उसकी पत्नी दर्ज किया जाना अपने आप में वैध शादी का अंतिम अथवा अकाट्य प्रमाण नहीं हो सकता। इस प्रकरण में 2004 की मतदाता सूची में महिला को सचिता की पत्नी दर्शाया गया था, जबकि 2009 की सूची में पुनः उनके पहले पति सुरेश चौधरी का नाम दर्ज था।
इसी प्रकार, भरण-पोषण (मासिक खर्च) के मुकदमे में पारित आदेश भी विवाह की वैधता पर अंतिम मुहर नहीं लगाता। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत होने वाली सुनवाई का मुख्य ध्येय केवल आर्थिक सहायता तय करना होता है, न कि विवाह के कानूनी अस्तित्व का फैसला करना।
अदालत ने टिप्पणी की कि हिंदू विवाह अधिनियम (Hindu Marriage Act) की धारा 7 के अनुसार, जब तक अनिवार्य धार्मिक रस्में पूरी न की गई हों, तब तक विवाह को कानूनी रूप से मान्यता नहीं दी जा सकती। यदि शादी में बुनियादी रस्में ही न हुई हों, तो केवल मैरिज रजिस्ट्रेशन (पंजीकरण) कराने से भी उस वैधानिक कमी को पूरा नहीं किया जा सकता। प्रथम दृष्टया विवाह का विधिवत संपन्न होना अनिवार्य है। इन सभी आधारों को देखते हुए हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को यथावत बनाए रखा।
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