
डिजिटल डेस्क। सुप्रीम कोर्ट ने मातृत्व संरक्षण को लेकर एक युगांतरकारी निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मातृत्व एक मौलिक मानवाधिकार है और इसका लाभ बच्चे के जन्म देने के तरीके (जैविक या गोद लिया हुआ) के आधार पर भेदभावपूर्ण नहीं हो सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक सुरक्षा संहिता की उस धारा को असंवैधानिक करार दे दिया है, जो अब तक केवल 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने पर ही मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) की अनुमति देती थी।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने कहा कि यदि बच्चा 3 महीने से अधिक उम्र का है, तब भी गोद लेने वाली माता को अवकाश से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट के अनुसार, कानून की नजर में 'गोद लिया बच्चा' और 'जैविक बच्चा' पूरी तरह समान हैं।
सुनवाई के दौरान पीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा...
"पारंपरिक रूप से जीव विज्ञान को रिश्तेदारी का मुख्य कारक माना जाता रहा है, लेकिन गोद लेना भी उतना ही मान्य तरीका है। परिवार केवल जैविक कारकों से नहीं, बल्कि साझा अर्थों और संवेदनाओं से बनता है।"
अदालत ने जोर देकर कहा कि 3 महीने से बड़े बच्चे को गोद लेने वाली माँ की जिम्मेदारियां भी उतनी ही होती हैं जितनी किसी अन्य मां की, इसलिए उनके अधिकारों में कटौती नहीं की जा सकती।
पुराना नियम: सामाजिक सुरक्षा संहिता की धारा 60 (4) के तहत, मातृत्व अवकाश केवल तभी मिलता था जब गोद लिए गए बच्चे की उम्र 3 महीने से कम हो।
नया बदलाव: अब गोद लिए गए बच्चे की उम्र कितनी भी हो, उसे गोद लेने वाली महिला कर्मचारी मैटरनिटी लीव की हकदार होगी।
भारत में मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत महिला कर्मचारियों के लिए निम्नलिखित सुविधाएं निर्धारित हैं...