
डिजिटल डेस्क। लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक के गिरने के बाद, रविवार को सरकार ने विधानसभाओं और संसद में महिलाओं के आरक्षण से जुड़े 'अक्सर पूछे जाने वाले सवालों' (FAQs) की एक सूची जारी की। इस विधेयक का उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देना था।
यह स्पष्टीकरण (FAQs) विपक्ष के उन दावों के बीच आया है, जिसमें कहा गया था कि महिला कोटे के नाम पर सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर अपनी मर्जी से परिसीमन (सीटों का नए सिरे से निर्धारण) करने की कोशिश कर रही है।
सरकार द्वारा जारी किए गए FAQs:-
सवाल:- 16 अप्रैल 2026 को सरकार कौन से बिल लाई थी?
जवाब:- सरकार ने तीन मुख्य बिल पेश किए थे: महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन बिल, सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए परिसीमन (Delimitation) बिल और केंद्र शासित प्रदेशों से जुड़ा एक बिल।
सवाल:- ये बिल अभी क्यों लाए गए?
जवाब:- 2023 के कानून के अनुसार, महिला आरक्षण 2026 के बाद होने वाली जनगणना और परिसीमन के बाद ही मिलना था। अगर सरकार जनगणना का इंतजार करती, तो महिलाओं को 2029 के चुनाव में भी आरक्षण नहीं मिल पाता। इसलिए, महिलाओं को जल्दी लाभ देने के लिए इन बिलों को लाना जरूरी था।
सवाल:- बिल पास होने से क्या फायदा होता?
जवाब:- अगर ये बिल पास हो जाते, तो महिलाओं को 2029 के आम चुनाव से ही लोकसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण मिलना शुरू हो जाता।
सवाल:- सीटों की संख्या बढ़ाना क्यों जरूरी था?
जवाब:- आखरी बार लोकसभा की सीटें 1976 में तय की गई थीं, तब देश की आबादी 54 करोड़ थी। आज आबादी 140 करोड़ है। सही प्रतिनिधित्व के लिए सीटों को 550 से बढ़ाकर 850 करना जरूरी है।
सवाल:- क्या इससे चल रहे चुनाव प्रभावित होते?
जवाब:- नहीं। तमिलनाडु या पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में चल रहे चुनावों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता। 2029 तक के चुनाव पुरानी व्यवस्था से ही होंगे।
सवाल:- लोकसभा की सीटें 850 ही क्यों?
जवाब:- सरकार ने सभी राज्यों की सीटें एक समान (50 प्रतिशत) बढ़ाने का फार्मूला रखा था। मौजूदा 543 सीटों में 50% की बढ़ोतरी करने पर यह संख्या करीब 815 होती है, इसलिए अधिकतम सीमा 850 तय की गई।
सवाल:- क्या दक्षिण भारतीय राज्यों को इससे नुकसान होता?
जवाब:- बिलकुल नहीं। सभी राज्यों की सीटें बराबर अनुपात में बढ़तीं। दक्षिण भारत के पांच राज्यों की सीटें 129 से बढ़कर 195 हो जातीं। उनकी हिस्सेदारी कम होने के बजाय थोड़ी बढ़कर 23.87% हो जाती।
सवाल:- क्या कम आबादी वाले राज्यों को नुकसान होता?
जवाब:- नहीं, क्योंकि सीटें हर राज्य में एक समान बढ़ाई जा रही थीं, इसलिए उनका अनुपात नहीं बदलता।
सवाल:- क्या एससी-एसटी (SC/ST) आरक्षण पर असर पड़ता?
जवाब:- नहीं, बल्कि फायदा होता। सदन बड़ा होने से एससी-एसटी के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी काफी बढ़ जाती।
सवाल:- क्या यह बिल जाति जनगणना को टालने के लिए था?
जवाब:- नहीं, सरकार ने जाति जनगणना के लिए पहले ही समय सीमा तय कर दी है और यह काम जनसंख्या की गिनती के साथ किया जाएगा।
सवाल:- मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग कोटा क्यों नहीं था?
जवाब:- भारत का संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता। आरक्षण केवल सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया जाता है।
सवाल:- 2024 के चुनाव में इसे क्यों लागू नहीं किया गया?
जवाब:- आरक्षण के लिए सीटों की सीमा तय करना (परिसीमन) एक लंबी प्रक्रिया है, जिसमें करीब दो साल का समय लगता है। इसीलिए ये बिल अब लाए गए थे।
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सवाल:- अगर तुरंत लागू नहीं करना था, तो 2023 में बिल क्यों लाए?
जवाब:- 2023 में बिल इसलिए लाया गया था ताकि महिला आरक्षण के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा तैयार किया जा सके।
सवाल:- केंद्र शासित प्रदेशों के लिए अलग बिल क्यों?
जवाब:- जम्मू-कश्मीर, दिल्ली और पुडुचेरी जैसी जगहों की विधानसभाएं अलग नियमों से चलती हैं, इसलिए वहां महिला आरक्षण लागू करने के लिए अलग बिल की जरूरत थी।
(शीर्षक को छोड़कर, इस लेख को 'नईदुनिया' के स्टाफ द्वारा संपादित नहीं किया गया है)