
धर्म डेस्क। संकट मोचन, पवनपुत्र, बजरंगबली भगवान शिव के 11वें रुद्रावतार को हम अनगिनत नामों से पूजते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस 'हनुमान' नाम से पूरी दुनिया उन्हें जानती है, वह उनका जन्मजात नाम नहीं था?
वाल्मीकि रामायण और पौराणिक तथ्यों के अनुसार, उनके 'हनुमान' बनने के पीछे एक विस्मयकारी और साहसी घटना छिपी है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता अंजनी और केसरी के पुत्र का जन्म के समय नाम 'मारुति' रखा गया था। मारुति का अर्थ है 'मारुत' यानी वायु का पुत्र। बचपन से ही विलक्षण शक्तियों के स्वामी मारुति अत्यंत नटखट और पराक्रमी थे।

वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में वर्णित कथा के अनुसार, एक सुबह नन्हे मारुति को तीव्र भूख लगी। आकाश में चमकते सूर्य को उन्होंने एक मीठा फल समझा और उसे खाने के लिए उड़ चले। इस दृश्य से देवराज इंद्र भयभीत हो गए। ब्रह्मांड को बचाने के लिए इंद्र ने मारुति पर अपने सबसे शक्तिशाली अस्त्र 'वज्र' से प्रहार किया।
नाम का अर्थ - यह वज्र सीधे बालक की ठोड़ी पर लगा। संस्कृत में ठोड़ी (Jaw) को 'हनु' कहा जाता है। वज्र के प्रहार से उनकी 'हनु' टेढ़ी या खंडित (मान) हो गई, जिसके बाद से उन्हें 'हनुमान' के नाम से पुकारा जाने लगा।
सिर्फ 'हनुमान' ही नहीं, उनका एक और प्रिय नाम 'सुंदर' भी था। कहा जाता है कि माता अंजनी उन्हें प्यार से इसी नाम से बुलाती थीं। रामचरितमानस के 'सुंदरकांड' का नाम इसी आधार पर रखा गया है।
यह रामायण का एकमात्र ऐसा अध्याय है जिसका नाम किसी स्थान (जैसे अयोध्या या लंका) के बजाय हनुमान जी के विशेष नाम पर आधारित है, क्योंकि इसमें उनके 'सुंदर' स्वरूप और वीरता का वर्णन है।
इंद्र के प्रहार के बाद जब वायुदेव ने संसार की वायु रोक दी, तब सृष्टि में हाहाकार मच गया। बालक की चेतना वापस आने पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित सभी देवताओं ने उन्हें दिव्य शक्तियां प्रदान कीं। इसी घटना के बाद वे अष्ट सिद्धि और नौ निधि के दाता बने और उनका 'हनुमान' नाम युगों-युगों के लिए अमर हो गया।