
धर्म डेस्क। संत कबीरदास जी भारतीय संत परंपरा के ऐसे महान व्यक्तित्व थे, जिनकी शिक्षाएं आज भी लोगों को सच्चाई, प्रेम और मानवता का मार्ग दिखाती हैं। उनके अनुयायी केवल हिंदू समाज तक सीमित नहीं थे, बल्कि मुस्लिम समुदाय में भी उन्हें समान सम्मान मिला।
उन्होंने धर्म के नाम पर फैली कुरीतियों और अंधविश्वासों का विरोध किया और लोगों को सादगी व सत्य का रास्ता अपनाने की प्रेरणा दी। यही कारण है कि हर वर्ष उनकी जयंती श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाई जाती है।
हर साल ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा तिथि को संत कबीरदास जयंती मनाई जाती है। वर्ष 2026 में यह पर्व 29 जून को मनाया जाएगा।
कबीरदास जी के जन्मस्थान और जन्म वर्ष को लेकर विद्वानों के बीच अलग-अलग मत हैं। कुछ मान्यताओं के अनुसार उनका जन्म 1398 ईस्वी में काशी में हुआ था, जबकि कुछ लोग मानते हैं कि उनका जन्म 1518 ईस्वी में मगहर में हुआ। कहा जाता है कि उनका पालन-पोषण नीरू और नीमा नामक जुलाहा दंपति ने किया था। बचपन से ही उनका झुकाव भक्ति और अध्यात्म की ओर था।
संत कबीरदास जी के धर्म को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है। कुछ लोग उन्हें हिंदू संत मानते हैं तो कुछ मुस्लिम फकीर। हालांकि, कबीरदास ने स्वयं को कभी किसी एक धर्म तक सीमित नहीं रखा। उनके लिए राम और अल्लाह दोनों एक ही परम सत्य के रूप थे।
उनके दोहों में हिंदू और मुस्लिम दोनों परंपराओं की झलक मिलती है। उन्होंने लोगों को यह समझाने का प्रयास किया कि ईश्वर को पाने के लिए दिखावे, मंदिर या मस्जिद की नहीं, बल्कि सच्चे मन और भक्ति की आवश्यकता होती है।
संत कबीरदास जी ने प्रेम, भाईचारे और मानवता का संदेश दिया। उनका मानना था कि ईश्वर एक है और इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं। उन्होंने लोगों को जाति, धर्म और बाहरी भेदभाव से ऊपर उठकर जीवन जीने की सीख दी।
नोट - यह जानकारी धार्मिक मान्यताओं और लोक कथाओं पर आधारित है। अलग-अलग विद्वानों के मत भिन्न हो सकते हैं। नईदुनिया इसकी पुष्टि नहीं करता। इसके लिए किसी विषेशज्ञ की सलाह अवश्य लें।