
धर्म डेस्क। हिंदू धर्म में विवाह से पहले कुंडली मिलान की परंपरा सदियों से चली आ रही है। आमतौर पर माना जाता है कि यदि वर-वधू के 36 में से 28 या उससे अधिक गुण मिल जाएं, तो वैवाहिक जीवन सुखद रहेगा। लेकिन कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि अच्छे गुण मिलने के बावजूद रिश्तों में तनाव बढ़ जाता है और बात अलगाव तक पहुंच जाती है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, केवल गुण मिलान ही विवाह की सफलता तय नहीं करता। कुंडली में मौजूद दोष और ग्रहों की स्थिति भी उतनी ही महत्वपूर्ण मानी जाती है। यही वजह है कि कई बार 30 से ज्यादा गुण मिलने के बाद भी शादीशुदा जीवन में परेशानियां बनी रहती हैं।
कुंडली मिलान में कुल 36 गुण होते हैं, जो मानसिक और भावनात्मक अनुकूलता को दर्शाते हैं। लेकिन सफल वैवाहिक जीवन के लिए सातवें भाव (विवाह भाव), आठवें भाव और ग्रहों की स्थिति को भी देखा जाता है। यदि विवाह का स्वामी ग्रह कमजोर हो, तो रिश्ते में स्थिरता की कमी आ सकती है।
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ज्योतिष शास्त्र में नाड़ी दोष को गंभीर दोषों में गिना जाता है। यदि वर और वधू की नाड़ी समान हो, तो इसे नाड़ी दोष कहा जाता है। मान्यता है कि इससे वैवाहिक जीवन में स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां और संतान सुख में बाधा आ सकती है। कई बार यह पति-पत्नी के बीच विचारों के टकराव का कारण भी बनता है।
मंगल ग्रह को ऊर्जा, साहस और क्रोध का कारक माना गया है। यदि एक साथी मांगलिक हो और दूसरा न हो, तो दोनों के स्वभाव और व्यवहार में असंतुलन पैदा हो सकता है। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, इससे विवाद और तनाव बढ़ने की संभावना रहती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि केवल गुण मिलान के आधार पर विवाह का फैसला नहीं करना चाहिए। कुंडली के अन्य पहलुओं, स्वभाव, पारिवारिक समझ और आपसी सामंजस्य को भी महत्व देना जरूरी है।
नोट - यह लेख धार्मिक मान्यताओं और ज्योतिषीय विचारों पर आधारित है। अलग-अलग ज्योतिषियों और परंपराओं की राय भिन्न हो सकती है। नईदुनिया इन दावों की पुष्टि नहीं करता।