
धर्म डेस्क। नवरात्र केवल आस्था और भक्ति का पर्व और शक्ति साधना, खगोलीय विज्ञान और चेतना के जागरण का महापर्व है। सनातन परंपरा में आदिशक्ति को सृष्टि की मूल ऊर्जा, सृजन, पालन और संहार की आधारशक्ति माना गया है।
प्राचीन ग्रंथों जैसे मार्कण्डेय पुराण और ऋग्वेद में देवी की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है, जहां उन्हें समस्त ब्रह्मांड की संचालक शक्ति बताया गया है। यही कारण है कि नवरात्र के नौ दिन साधना, आत्मनियंत्रण और सकारात्मक ऊर्जा के संचय के लिए विशेष महत्व रखते हैं।
भारतीय मनीषियों ने नारी शक्ति को केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और दार्शनिक आधार पर भी समझाया है। देवी सूक्त में वर्णित आदिशक्ति स्वयं को राष्ट्र को संचालित करने वाली शक्ति बताती हैं। यह विचार दर्शाता है कि स्त्री शक्ति सृजन और संतुलन की मूल धुरी है। आधुनिक समय में भी नारी शक्ति को वैश्विक स्तर पर महत्व दिया जा रहा है, जो भारतीय परंपरा की प्रासंगिकता को सिद्ध करता है।
नवरात्र की साधना में “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं” मंत्र का विशेष महत्व है। इसमें ऐं ज्ञानशक्ति, क्लीं क्रियाशक्ति और ह्रीं मायाशक्ति का प्रतीक है। इन तीनों के माध्यम से सृष्टि के निर्माण, संचालन और विनाश का वैज्ञानिक विश्लेषण मिलता है। साथ ही सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रवृत्तियों की मनोवैज्ञानिक व्याख्या भी इन मंत्रों में निहित है।
भारतीय परंपरा में रात्रि को सिद्धि और साधना का समय माना गया है। वैज्ञानिक दृष्टि से भी रात्रि में ध्वनि तरंगों का प्रसार अधिक स्पष्ट होता है, जिससे मंत्रोच्चार और ध्यान का प्रभाव बढ़ जाता है। यही कारण है कि नवरात्र, दीपावली और महाशिवरात्रि जैसे प्रमुख पर्वों में रात्रि साधना को विशेष महत्व दिया गया है।
नवरात्र के दौरान शंख, घंटी और वाद्य यंत्रों के उपयोग से उत्पन्न ध्वनि तरंगें वातावरण को शुद्ध करने में सहायक मानी जाती हैं। यह परंपरा न केवल आध्यात्मिक शांति देती है, बल्कि पर्यावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार भी करती है।
एक वर्ष में चार संधि काल चैत्र, आषाढ़, अश्विन और माघ होते हैं। इन संधियों पर नवरात्र मनाने की परंपरा है, जो प्रकृति और मानव जीवन के संतुलन का प्रतीक है। चैत्र नवरात्र विशेष रूप से नववर्ष के आरंभ के साथ जुड़ा हुआ है, जिसे सृष्टि के नवचक्र की शुरुआत माना जाता है।
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होने वाला हिंदू नववर्ष खगोलीय गणनाओं पर आधारित है। मान्यता है कि इसी दिन ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना प्रारंभ की थी। इस वर्ष विक्रम संवत 2083 का आरंभ गुरुवार से हुआ है, जिससे बृहस्पति को वर्ष का राजा माना गया है, जबकि मंगल मंत्री के रूप में प्रभावी रहेगा। ज्योतिष के अनुसार यह संयोग समाज, शिक्षा, व्यापार और धार्मिक गतिविधियों के लिए सकारात्मक संकेत देता है।