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Dahi Handi Celebration 2026: जन्माष्टमी के अगले दिन क्यों फोड़ी जाती है मटकी? जानिए इसके पीछे का रोचक इतिहास

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अगले दिन मनाए जाने वाले 'दही हांडी' उत्सव का पौराणिक और आध्यात्मिक महत्व भी है। यह भगवान कान्हा की नटखट माखन-चोरी की लीला आज ए...और पढ़ें

By Akriti KumariEdited By: Akriti Kumari
Publish Date: Fri, 04 Sep 2026 11:23:06 AM (IST)Updated Date: Fri, 04 Sep 2026 11:23:06 AM (IST)
Dahi Handi Celebration 2026: जन्माष्टमी के अगले दिन क्यों फोड़ी जाती है मटकी? जानिए इसके पीछे का रोचक इतिहास
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अगले दिन भक्ति, उत्साह और टीमवर्क के साथ मनाई जाने वाली दही हांडी। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. द्वापरयुग में ब्रज की गोपियां ऊंचाई पर माखन लटका देती थीं
  2. इसे चुराने के लिए बाल-गोपाल और उनके दोस्त पिरामिड बनाते
  3. महाराष्ट्र सहित देशभर में 'गोविंदा आला रे' उत्सव मनाया जाता है

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। कृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व के बाद अगले दिन देशभर में, विशेषकर महाराष्ट्र में, 'दही हांडी' का उत्सव बड़े ही धूमधाम और उल्लास के साथ मनाया जाता है। ढोल-नगाड़ों की थाप, 'गोविंदा आला रे' के जयकारे और हवा में झूलती दही-माखन से भरी मटकियां इस त्योहार की पहचान हैं।

यह केवल एक खेल या मनोरंजन का आयोजन नहीं है, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का एक जीवंत और प्रतीकात्मक रूप है।

बाल-गोपाल की नटखट लीला से जुड़ी परंपरा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बालगोपाल श्रीकृष्ण को माखन और दही अत्यंत प्रिय था। बचपन में वे गोकुल की गलियों में अपने बाल-सखाओं के साथ घूमते और मौका मिलते ही घरों में रखी माखन-दही की मटकियों से चोरी करके खा लिया करते थे।


  • गोपियों की तरकीब: कान्हा की इन शरारतों से तंग आकर ब्रज की गोपियों ने माखन को सुरक्षित रखने के लिए मटकियों को घर की छतों और सीलिंग से काफी ऊंचाई पर लटकाना शुरू कर दिया।
  • मानव पिरामिड की शुरुआत: नटखट कान्हा भी कहां पीछे हटने वाले थे। उन्होंने ऊंचाई तक पहुंचने के लिए अपने सभी दोस्तों को इकट्ठा किया और एक-दूसरे के ऊपर चढ़कर 'मानव पिरामिड' (Human Pyramid) बनाया। सबसे ऊपर चढ़कर कान्हा या उनका कोई सखा मटकी फोड़ देता और सभी मित्र मिलकर माखन का आनंद लेते थे।

दही हांडी उत्सव का स्वरूप

जन्माष्टमी के अगले दिन श्रीकृष्ण की इसी बाल लीला को पुनर्जीवित किया जाता है-

  • गोविंदाओं की टोली: युवाओं के समूहों को 'गोविंदा' कहा जाता है।
  • आयोजन: ऊंचाई पर रस्सी के सहारे मटकी बांधी जाती है, जिसमें दही, माखन, मेवे और हल्दी-पानी भरा होता है।
  • पुरस्कार और धूम: गोविंदाओं की टोलियां कई परतों (Layers) का मानव पिरामिड बनाकर मटकी तक पहुंचती हैं और उसे तोड़ती हैं। मटकी फूटते ही माखन-दही नीचे गिरता है और माहौल आनंद से भर जाता है।

महाराष्ट्र में विशेष आकर्षण और भव्यता

हालांकि अब दही हांडी की धूम पूरे भारत में है, लेकिन महाराष्ट्र (मुंबई, ठाणे, पुणे) में इसका भव्य रूप देखने को मिलता है। यहां कई मंजिला ऊंची दही हांडी बांधी जाती है और इसे फोड़ने वाली विजयी मंडली को बड़े नकद पुरस्कारों और ट्रॉफियों से सम्मानित किया जाता है।

एकता, सहयोग और सामूहिक प्रयास का प्रतीक

दही हांडी का पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह जीवन के कई महत्वपूर्ण संदेश भी देता है-

  • टीम वर्क और एकता: मानव पिरामिड में नीचे खड़े व्यक्ति से लेकर सबसे ऊपर चढ़ने वाले गोविंदा तक, हर एक का संतुलन और सहयोग जरूरी होता है।
  • सामूहिक प्रयास से सफलता: यह उत्सव सिखाता है कि जब लोग एकजुट होकर प्रयास करते हैं, तो कितनी भी ऊंची चुनौती (लक्ष्य) को आसानी से हासिल किया जा सकता है।

धार्मिक मान्यता है कि निष्छल भाव और उत्साह के साथ दही हांडी उत्सव में भाग लेने या देखने से भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद मिलता है और घर में सुख, शांति तथा समृद्धि का वास होता है।

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