
खेल डेस्क। तारीख 24 अप्रैल... आज जब पूरी दुनिया क्रिकेट के उस महानायक का 53वां जन्मदिन (Sachin Tendulkar Birthday) मना रही है, जिसकी एक झलक पाने के लिए स्टेडियम में 'सचिन-सचिन' के नारों का समंदर उमड़ पड़ता था। तब हमें उस इंसान के उस रूप को भी याद करना चाहिए, जिसने निजी पीड़ा के श्मशान पर कर्तव्य का विजय पताका फहराया था।
100 अंतरराष्ट्रीय शतकों का हिमालय खड़ा करने वाले सचिन तेंदुलकर के जीवन में एक शतक ऐसा भी था, जिसकी स्याही उनके आंसुओं से लिखी गई थी। बात मई 1999 की है, इंग्लैंड में वर्ल्ड कप चल रहा था। तभी खबर आई कि सचिन के पिता, प्रोफेसर रमेश तेंदुलकर का निधन हो गया है। जो बेटा अभी क्रीज पर देश की उम्मीदें संवार रहा था, उसे अचानक अपने पिता की चिता को मुखाग्नि देने के लिए भारत लौटना पड़ा।
पिता के अंतिम संस्कार के बाद सचिन बुरी तरह टूट चुके थे। वह कमरे के एक कोने में सिमटकर उस पिता को याद कर रहे थे, जिन्होंने उन्हें बल्ला थामना सिखाया था। उस वक्त उनके सामने क्रिकेट नहीं, बल्कि जीवन का सबसे गहरा अंधेरा था। तब उनकी मां ने तब उनसे एक ऐसी बात कही जिसने इतिहास बदल दिया। उन्होंने कहा, "तुम्हारे पिता चाहते थे कि तुम देश के लिए खेलो।"
पिता के जाने के चार दिन बाद, सूजी आंखों और भारी दिल के साथ सचिन फिर इंग्लैंड पहुंचे। केन्या के खिलाफ मैच था। सचिन ने उस दिन मैदान पर कदम रखा, तो उनका बल्ला नहीं, उनका कलेजा बोल रहा था। उन्होंने नाबाद 140 रनों की पारी खेली। शतक पूरा होते ही सचिन ने पहली बार बल्ले को आसमान की ओर उठाकर अपने पिता को याद किया। वह दृश्य आज भी क्रिकेट इतिहास का सबसे भावुक क्षण है। मैदान पर खड़ा खिलाड़ी मुस्कुरा रहा था, लेकिन भीतर एक बेटा रो रहा था।
मौजूदा समय में वनडे क्रिकेट में दोहरा शतक जड़ने वाले खिलाड़ियों की भरमार है। हालांकि सचिन यह कारनामा करने वाले दुनिया के पहले बल्लेबाज हैं। उन्होंने साल 2010 में ग्वालियर के कैप्टन रूप सिंह स्टेडियम में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ वनडे क्रिकेट का पहला दोहरा शतक (200)* जड़कर इतिहास रच दिया था। ग्वालियर की जनता और प्रशासन इस ऐतिहासिक पल से इतने अभिभूत हुए कि उन्होंने इसे अमर बनाने का फैसला किया।
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स्टेडियम के पास की प्रमुख सड़क, जो लक्ष्मीबाई नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिकल एजुकेशन (LNIPE) की ओर जाती है, उसका नाम बदलकर 'सचिन तेंदुलकर मार्ग' कर दिया गया। यह केवल एक सड़क का नाम नहीं है, बल्कि उस महान खिलाड़ी के जज्बे को सलाम है, जिसने व्यक्तिगत दुख को पीछे छोड़कर देश को गौरव दिलाया।