
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। इंदौर के पुगलिया परिवार पर कहर बनकर टूटी ईवी कार की आग ने एक बड़ा सवाल सामने रख दिया है। क्या हम ईवी के खतरों को लेकर पर्याप्त सतर्क हैं? घर के बाहर रातभर चार्जिंग पर लगी कार ने सुबह-सवेरे आठ जिंदगियां निगल लीं। यह हादसा सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि लाखों ईवी मालिकों के लिए एक सख्त चेतावनी है।
सड़क परिवहन मंत्रालय के ई-डिटेल्ड एक्सीडेंट रिपोर्ट पोर्टल के अनुसार, देशभर में 2023 में ईवी से जुड़े 5,594 हादसे हुए जिनमें आठ आग की घटनाएं थीं, 2024 में यह संख्या बढ़कर 7,817 हादसे और नौ अग्निकांड हो गई, जबकि 2025 में 10,454 हादसे दर्ज हुए जिनमें नौ आग की घटनाएं शामिल थीं।
आंकड़े कम लग सकते हैं, लेकिन हर एक घटना का परिणाम कितना विनाशकारी हो सकता है, यह इंदौर ने देख लिया। भारत में ईवी आग की घटनाएं 2019 से ही सामने आने लगी थीं और इनमें बैटरी शार्ट सर्किट को मुख्य कारण माना गया।
ईवी की आग साधारण आग नहीं होती। इसके पीछे 'थर्मल रनअवे' नामक एक खतरनाक रासायनिक प्रक्रिया होती है। जब बैटरी की एक सेल अत्यधिक गर्म होती है तो यह प्रक्रिया पड़ोसी सेल्स तक फैलती है और एक स्व-संचालित आग का रूप ले लेती है। यह आग बाहरी ऑक्सीजन के बिना भी जलती रहती है क्योंकि बैटरी के भीतर रासायनिक प्रतिक्रियाएं ही इसे ईंधन देती रहती हैं। इसके साथ मीथेन और हाइड्रोजन जैसी ज्वलनशील गैसें निकलती हैं, जो आग को और भयावह बना देती हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि ईवी बैटरी की आग बुझाने के बाद भी 24 से 48 घंटे तक दोबारा भड़क सकती है क्योंकि क्षतिग्रस्त सेल्स भीतर ही गर्म होती रहती हैं। इसीलिए दमकल विभाग अब ईवी अग्निकांड स्थलों पर 24-48 घंटे तक निगरानी रखता है। ईवी की आग 1,200 डिग्री फेरेनहाइट (करीब 649 डिग्री सेल्सियस) से अधिक तापमान पर जलती है, जो पारंपरिक वाहन की आग से कहीं अधिक है।
पानी बैटरी की आग को अस्थायी रूप से ठंडा कर सकता है, लेकिन सेल्स के भीतर होने वाली विद्युत रासायनिक प्रतिक्रिया को नहीं रोक सकता। ईवी की आग बुझाने में पेट्रोल गाड़ी की तुलना में दस गुना अधिक पानी लग सकता है। अब दमकल दल पारंपरिक तरीके से आग बुझाने की बजाय ईवी फायर ब्लैंकेट से आग को घेरने और आक्सीजन की आपूर्ति काटने की विधि अपना रहे हैं।
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