
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। भारत सरकार के सड़क परिवहन मंत्रालय ने यात्री वाहनों के लिए नए 'कॉरपोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी' (CAFE) नियमों का मसौदा पेश किया है, जिन्हें 1 अप्रैल 2027 से प्रभावी किया जाएगा। इस पहल का मुख्य फोकस वाहनों की ईंधन दक्षता बढ़ाना, कार्बन उत्सर्जन कम करना, विदेश से तेल आयात पर निर्भरता घटाना और वर्ष 2070 तक देश को 'नेट-जीरो' उत्सर्जन लक्ष्य की ओर ले जाना है।
पर्यावरण-अनुकूल वाहनों को बढ़ावा देने के लिए सरकार निर्माताओं को 'सुपर क्रेडिट' प्रणाली की सुविधा देगी। इसके तहत, कागजी गणना में 1 ईवी को 3 वाहनों और 1 हाइब्रिड कार को 1.5 वाहनों के बराबर माना जाएगा। इससे कंपनियों के लिए अपने औसत उत्सर्जन कोटा को संतुलित करना आसान होगा, और वे ग्राहकों को रियायती दरों या विशेष ऑफर्स का लाभ दे सकेंगी।
निर्धारित सीमा से अधिक प्रदूषण फैलाने वाली गाड़ियां निर्माताओं के लिए आर्थिक बोझ बनेंगी। इस वित्तीय भार की भरपाई कंपनियां वाहनों के दाम बढ़ाकर सीधे उपभोक्ताओं से करेंगी।
85% से 100% एथेनॉल पर चलने वाले पेट्रोल वाहनों को 22.3% उत्सर्जन में छूट दी जाएगी। कंपनी द्वारा बेची गई प्रत्येक ऐसी कार को कागजों पर 1.1 कार का मूल्य दिया जाएगा।
E20-समर्थित गाड़ियों को कार्बन उत्सर्जन गणना में 8% की राहत मिलेगी। हालांकि, टायर प्रेशर मॉनिटरिंग और बेहतर गियरबॉक्स जैसी अनिवार्य फ्यूल-सेविंग तकनीकों के कारण शुरुआती मॉडलों के दाम थोड़े बढ़ सकते हैं।
नीति डीजल तकनीक पर सीधा प्रतिबंध नहीं लगाती, परंतु किसी विशेष छूट का प्रावधान न होने के कारण यह निर्माताओं के लिए कम लाभदायक साबित होगी। जुर्माने से बचने के लिए कंपनियां डीजल गाड़ियों की कीमतें बढ़ा सकती हैं, जिससे इनकी बाजार में मांग घट सकती है।
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भारत अब पुराने MIDC टेस्टिंग सिस्टम के बजाय वैश्विक स्तर पर स्वीकृत WLTP प्रणाली को अपनाएगा, जो गाड़ियों का अधिक सटीक और वास्तविक माइलेज दर्ज करती है। 5% तक ईंधन बचत सुनिश्चित करने के लिए 6-स्पीड या उससे अधिक गियर वाली प्रणालियों को प्रोत्साहित किया जाएगा।
ये नियम केवल 1 अप्रैल 2027 के बाद निर्मित या आयातित होने वाली नई कारों (M1 श्रेणी) पर लागू होंगे। पुरानी चलती हुई गाड़ियों और प्रतिवर्ष 1,000 से कम वाहनों का उत्पादन करने वाली छोटी कंपनियों को इससे छूट प्राप्त होगी।