यूपी के 24 गांवों की दो सौ साल पुरानी होली की अजब कहानी, पहले मनाते हैं शोक फिर उड़ाते हैं गुलाल
यमुना की शांत धाराओं के बीच, कौशांबी और चित्रकूट की सरहद पर बसे 24 गांवों में होली की सुबह कुछ अलग ही होती है। ...और पढ़ें
Publish Date: Tue, 03 Mar 2026 04:17:42 PM (IST)Updated Date: Tue, 03 Mar 2026 04:21:24 PM (IST)
HighLights
- बच्चे भी उस दिन रंगों से दूरी बनाए रखते हैं
- इस दिन को यहां 'बैजला' कहा जाता है
- धुलेंडी के दिन गांवों में न ढोल न गुलाल
डिजिटल डेस्क। यमुना की शांत धाराओं के बीच, कौशांबी और चित्रकूट की सरहद पर बसे 24 गांवों में होली की सुबह कुछ अलग ही होती है। जहां पूरे देश में धुलेंडी के दिन ढोल की थाप गूंजती है, रंगों के बादल उड़ते हैं, वहीं इन गांवों में एक अजीब-सी खामोशी उतर आती है।
गलियां सूनी रहती हैं, चौपाल पर बैठे बुजुर्गों के चेहरे गंभीर होते हैं और बच्चे भी उस दिन रंगों से दूरी बनाए रखते हैं। इस दिन को यहां 'बैजला' कहा जाता है। यानी शोक का दिन।
करीब दो सौ साल पुरानी है कहानी
कहते हैं, जमींदारी दौर में बेरौंचा गांव के जमींदार पर एक दिन जंगल में अचानक एक जंगली जानवर ने हमला कर दिया। साथ चल रहा उनका वफादार सेवक बैजू बिना एक पल गंवाए जानवर से भिड़ गया। संघर्ष भयंकर था। बैजू ने अपने स्वामी की जान तो बचा ली, लेकिन खुद गंभीर रूप से घायल हो गया।
होली के दिन मेरे नाम पर शोक मनाइएगा
जब उसकी सांसें टूटने लगीं, तो जमींदार ने आंखों में आंसू भरकर पूछा, बैजू, आखिरी इच्छा क्या है तुम्हारी? बैजू ने धीमी आवाज में कहा, मालिक… होली के दिन मेरे नाम पर शोक मनाइएगा। उस दिन रंग मत खेलिएगा… ताकि लोग याद रखें कि एक सेवक ने अपना कर्तव्य निभाया था। जमींदार ने वचन दिया। और तभी से इन 24 गांवों में होली का रंग एक दिन ठहर जाता है।
धुलेंडी के दिन गांवों में न ढोल बजता है, न गुलाल उड़ता है
धुलेंडी के दिन गांवों में न ढोल बजता है, न गुलाल उड़ता है। लोग सादगी से दिन बिताते हैं। इसे 'बैजला' कहा जाता है। बैजू की स्मृति में मनाया जाने वाला मौन दिवस। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। अगले दिन, जब भाईदूज का सूरज उगता है, तो वही गांव रंगों से भर उठते हैं।
इसे यहां 'बैज की होली' कहा जाता है। अबीर-गुलाल उड़ता है, ढोलक की थाप गूंजती है, लोकगीत गाए जाते हैं और घर-घर में पारंपरिक पकवान बनते हैं। मानो पूरा गांव एक साथ कह रहा हो.. बलिदान की याद भी रहे और जीवन का उत्सव भी।
सीमावर्ती गांव आज भी इस परंपरा को निभाते हैं
कौशांबी और चित्रकूट के 12-12 सीमावर्ती गांव आज भी इस परंपरा को निभाते हैं। प्रशासन की निगरानी में यह अनोखी होली शांति और अनुशासन के साथ मनाई जाती है। गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि वचन, कर्तव्य और बलिदान की विरासत है।
इन 24 गांवों में एक दिन के लिए रंग थम जाते हैं
यमुना आज भी वैसे ही बहती है। मौसम हर साल बदलता है। नई पीढ़ियां जन्म लेती हैं। लेकिन जब होली आती है, तो इन 24 गांवों में एक दिन के लिए रंग थम जाते हैं ताकि इतिहास की वह कहानी फिर से जीवित हो सके, जिसमें एक सेवक ने अपनी निष्ठा से परंपरा को अमर कर दिया।