डिजिटल डेस्क, लखनऊ। राम मंदिर के चढ़ावे और कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े मामले की जांच कर रहे विशेष जांच दल (SIT) ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार कर ली है। सूत्रों के अनुसार, रिपोर्ट में श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय समेत 14 लोगों की विभिन्न स्तरों पर भूमिका और जवाबदेही का उल्लेख किया गया है।
बताया जा रहा है कि एसआईटी सोमवार को यह रिपोर्ट मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सौंपेगी और विस्तृत जांच के लिए अतिरिक्त समय भी मांग सकती है।
राजनीतिक हलकों में भी बहस तेज
मामले को लेकर राजनीतिक हलकों में भी बहस तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव लगातार श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि मंदिर के दान और चढ़ावे के हिसाब-किताब में गड़बड़ी हुई है तथा करोड़ों रुपये की राशि का स्पष्ट ब्योरा सामने नहीं आया है। हालांकि, इन आरोपों पर ट्रस्ट पहले ही अपना पक्ष रख चुका है और किसी भी तरह की अनियमितता से इनकार करता रहा है।
अयोध्या में चर्चा का विषय बना विवाद
रामनगरी अयोध्या में भी यह मामला चर्चा का केंद्र बना हुआ है। स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं के बीच इस विवाद को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़े मंदिर की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला विवाद मानते हैं, जबकि अन्य लोगों का कहना है कि इतने बड़े धार्मिक संस्थान में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होना जरूरी है।
ट्रस्ट के केंद्र में क्यों हैं चंपत राय?
मौजूदा विवाद के बीच सबसे अधिक चर्चा ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय की हो रही है। वर्तमान में वह श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के महासचिव होने के साथ-साथ विश्व हिंदू परिषद के उपाध्यक्ष भी हैं। सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले के बाद फरवरी 2020 में केंद्र सरकार ने श्रीरामजन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया था। 15 सदस्यीय इस ट्रस्ट को राम मंदिर निर्माण और उसके संचालन की जिम्मेदारी सौंपी गई।
महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मुख्य रूप से चंपत राय के पास
ट्रस्ट के दैनिक प्रशासन, निर्माण परियोजना की निगरानी, दान और चढ़ावे के प्रबंधन, विभिन्न एजेंसियों के साथ समन्वय और आधिकारिक संवाद जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मुख्य रूप से चंपत राय के पास रही हैं। इसी वजह से राम मंदिर से जुड़े किसी भी बड़े फैसले, घोषणा या विवाद के दौरान वह ट्रस्ट का सबसे प्रमुख सार्वजनिक चेहरा बनकर सामने आते रहे हैं।
शिक्षक से राम मंदिर आंदोलन के रणनीतिकार तक
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले से आने वाले चंपत राय का प्रारंभिक जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा से प्रभावित रहा। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत बिजनौर के आरएसएम डिग्री कॉलेज में रसायन विज्ञान के शिक्षक के रूप में की थी, लेकिन 1980 के दशक में अध्यापन छोड़कर संघ के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए।
राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख रणनीतिकारों में गिने जाते रहे
बाद में उन्हें विश्व हिंदू परिषद में संगठनात्मक जिम्मेदारियां सौंपी गईं। राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान वह उन प्रमुख लोगों में शामिल रहे, जिन्होंने संगठनात्मक रणनीति तैयार करने, दस्तावेज जुटाने, कानूनी पक्ष को मजबूत करने और आंदोलन से जुड़े विभिन्न पक्षों के बीच समन्वय का काम किया। संगठन से जुड़े लोगों के मुताबिक, वह लंबे समय तक राम मंदिर आंदोलन के प्रमुख रणनीतिकारों में गिने जाते रहे और विहिप के शीर्ष नेतृत्व में उनकी मजबूत पकड़ रही।
पहले भी विवादों में आ चुका है ट्रस्ट
राम मंदिर निर्माण के लिए 2021 में चलाए गए ‘निधि समर्पण अभियान’ के दौरान भी चंपत राय ट्रस्ट की ओर से प्रमुख भूमिका निभाते रहे। हालांकि, उसी वर्ष अयोध्या में भूमि खरीद के एक सौदे को लेकर ट्रस्ट विवादों में आ गया था। आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों ने आरोप लगाया था कि एक भूमि का मूल्य बेहद कम समय में कई गुना बढ़ाकर ट्रस्ट को बेचा गया। विपक्ष ने इस सौदे की जांच की मांग की थी।
उस समय चंपत राय और ट्रस्ट ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि भूमि खरीद की पूरी प्रक्रिया पारदर्शी थी, भुगतान बैंकिंग माध्यमों से किया गया था और सभी सौदे नियमानुसार हुए थे। ट्रस्ट ने आरोपों को राजनीतिक प्रेरित बताया था।
अब SIT अंतिम रिपोर्ट पर टिकी निगाहें
राम मंदिर चढ़ावा और वित्तीय प्रबंधन को लेकर उठे ताजा सवालों के बीच अब सभी की निगाहें एसआईटी की विस्तृत जांच और अंतिम रिपोर्ट पर टिकी हैं। प्रारंभिक रिपोर्ट सामने आने के बाद मामले ने राजनीतिक और धार्मिक दोनों स्तरों पर नई चर्चा को जन्म दे दिया है।
यदि जांच में अनियमितताओं की पुष्टि होती है तो ट्रस्ट की कार्यप्रणाली, जवाबदेही और भविष्य की व्यवस्था को लेकर बड़े फैसले लिए जा सकते हैं। वहीं दूसरी ओर ट्रस्ट से जुड़े लोग जांच पूरी होने तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से बचने की सलाह दे रहे हैं।