
डिजिटल डेस्क। उत्तर प्रदेश में बीते नौ वर्षों में त्योहारों ने केवल सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था का स्वरूप नहीं निभाया, बल्कि वे राज्य की अर्थव्यवस्था के सशक्त 'ग्रोथ इंजन' के रूप में उभरे हैं। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सुदृढ़ कानून-व्यवस्था, सुव्यवस्थित आयोजन और 'दीपोत्सव' जैसे भव्य उत्सवों ने प्रदेश में एक नई 'फेस्टिवल इकोनॉमी' की नींव रखी है।
प्रशासनिक और व्यापारिक संगठनों के आंकड़े बताते हैं कि होली, दीपावली और नवरात्र जैसे प्रमुख पर्वों के दौरान बड़े बाजारों में ग्राहकों की संख्या (फुटफॉल) में 30 से 50 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है।
यह वृद्धि केवल भीड़ तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक सक्रियता का संकेत है। त्योहारों के दौरान आर्थिक गतिविधियों में तेजी के पीछे सबसे अहम कारक है सुदृढ़ सुरक्षा व्यवस्था।
ड्रोन निगरानी, व्यापक सीसीटीवी कवरेज और इंटीग्रेटेड कंट्रोल रूम की व्यवस्था ने बाजारों को अधिक सुरक्षित और व्यवस्थित बनाया है। इससे ग्राहकों में विश्वास बढ़ा और खरीदारी का माहौल अनुकूल हुआ।
सुरक्षित वातावरण के कारण कपड़ा, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और सर्राफा जैसे खुदरा क्षेत्रों में सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक कारोबार दर्ज किया गया है। त्योहार अब व्यापारियों के लिए वर्ष के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक अवसर बन चुके हैं।
फेस्टिवल इकोनॉमी का सबसे बड़ा सकारात्मक प्रभाव समाज के अंतिम पायदान पर खड़े कारीगरों, लघु उद्यमियों और स्वयं सहायता समूहों पर पड़ा है। अयोध्या के दीपोत्सव और देव दीपावली जैसे आयोजनों ने कुम्हारों को लाखों दीयों के बड़े ऑर्डर दिलाए। इससे पारंपरिक शिल्प को नया जीवन मिला और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सीधा लाभ हुआ।
स्वयं सहायता समूह हर्बल गुलाल, टेराकोटा मूर्तियां, हस्तनिर्मित सजावटी सामग्री और त्योहार आधारित गिफ्ट पैक तैयार कर शहरी बाजारों में अपनी मजबूत पहचान बना रहे हैं। इससे ग्रामीण महिलाओं की आय और आत्मनिर्भरता दोनों में वृद्धि हुई है।
अयोध्या, वाराणसी और मथुरा जैसे प्रमुख धार्मिक नगरों में होटल ऑक्यूपेंसी, परिवहन सेवाएं (टैक्सी, ई-रिक्शा) और स्थानीय गाइड सेवाओं की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। इससे सेवा क्षेत्र को भी व्यापक प्रोत्साहन मिला है।
सरकार ने रामोत्सव, कृष्णोत्सव और बुद्ध महोत्सव जैसे आयोजनों को सुव्यवस्थित और भव्य रूप देकर उन्हें राज्य के पर्यटन कैलेंडर से जोड़ा है। जनप्रतिनिधियों और प्रशासन की सक्रिय भागीदारी ने स्वच्छता, बिजली, सड़क और यातायात प्रबंधन जैसी मूलभूत सुविधाओं को सुनिश्चित किया है। परिणामस्वरूप, त्योहारों के दौरान अव्यवस्था की संभावनाएं न्यूनतम हुई हैं।
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आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तर प्रदेश की 'फेस्टिवल इकोनॉमी' अब केवल मौसमी उछाल तक सीमित नहीं रही। यह टेंट हाउस, लाइटिंग, साउंड सिस्टम, इवेंट मैनेजमेंट और अस्थायी श्रम बाजार जैसे क्षेत्रों में स्थायी रोजगार का आधार बनती जा रही है।
स्पष्ट है कि आस्था और प्रशासनिक प्रबंधन के संयोजन से उत्तर प्रदेश ने एक ऐसा मॉडल विकसित किया है, जिसमें सांस्कृतिक विरासत और आर्थिक आत्मनिर्भरता एक-दूसरे के पूरक बन गए हैं।