डिजिटल डेस्क। भारत में 'निष्क्रिय इच्छामृत्यु' (Passive Euthanasia) का पहला कानूनी अधिकार पाने वाले गाजियाबाद के हरीश राणा का एम्स (AIIMS) में निधन हो गया है। 13 वर्षों तक कोमा के असहनीय दर्द और अनिश्चितता से जूझने के बाद, अंततः उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक आदेश के तहत सम्मानजनक मृत्यु प्राप्त हुई।
संघर्षपूर्ण रहा 13 वर्षों का सफर
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मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के रहने वाले हरीश राणा एक दशक पहले एक भीषण दुर्घटना का शिकार हुए थे, जिसके बाद वे कोमा में चले गए थे। उनके माता-पिता और भाई ने उन्हें वापस लाने के लिए अथक प्रयास किए। देशभर के विशेषज्ञों से राय ली गई और हर संभव इलाज कराया गया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ।
अंततः, अपने बेटे को तिल-तिल कर मरते देखने के बजाय उसे 'गौरवपूर्ण मृत्यु' दिलाने के लिए परिवार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए भारत में पहली बार परोक्ष इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) के तहत जीवन रक्षक प्रणाली हटाने की अनुमति दी थी।
अंगदान का संकल्प
हरीश की मृत्यु के बाद उनके परिवार ने एक प्रेरक निर्णय लेते हुए उनके अंगों को दान करने की इच्छा जताई है।
एम्स के सूत्रों के अनुसार, अब मेडिकल टीम यह जांच करेगी कि 13 साल तक कोमा में रहने के बाद कौन से अंग प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त हैं।
यदि अंग कार्यशील पाए जाते हैं, तो हरीश की किडनी, लीवर, हृदय, फेफड़े, अग्न्याशय और आंत का दान किया जा सकता है। इसके अलावा कॉर्निया और हृदय के वाल्व भी दूसरों को नई जिंदगी दे सकते हैं।
एम्स के डॉक्टरों की देखरेख में हुई प्रक्रिया
हरीश राणा की परोक्ष इच्छामृत्यु की प्रक्रिया को एम्स के विशेषज्ञों की एक विशेष टीम द्वारा चरणबद्ध तरीके से अंजाम दिया जा रहा था। हालांकि, अस्पताल की ओर से अभी आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है, लेकिन सूत्रों के अनुसार हरीश ने अंतिम सांस ले ली है।
यह मामला भारतीय न्यायपालिका और चिकित्सा जगत के इतिहास में एक नजीर के रूप में याद रखा जाएगा, जिसने 'जीने के अधिकार' के साथ-साथ 'मर्यादापूर्ण मृत्यु के अधिकार' पर भी मुहर लगाई है।