
डिजिटल डेस्क। भारत के कानूनी इतिहास में 'मर्यादापूर्ण मृत्यु' (Dignified Death) की पहली नजीर पेश करने वाले हरीश राणा का आज दिल्ली के एम्स (AIIMS) में निधन हो गया। 13 वर्षों तक कोमा की गहरी नींद और असहनीय पीड़ा झेलने के बाद, हरीश ने मंगलवार को अंतिम सांस ली।
सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक आदेश के तहत उन्हें 'पैसिव यूथेनेशिया' (परोक्ष इच्छामृत्यु) की अनुमति मिली थी, जिसके बाद डॉक्टरों की देखरेख में उनके जीवन रक्षक उपकरणों को हटाया गया।

हरीश राणा के पिता अशोक राणा ने साल 1989 में हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा से दिल्ली का रुख किया था, ताकि बच्चों को बेहतर भविष्य दे सकें। परिवार में सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन 20 अगस्त 2013 को एक हादसे ने सब बदल दिया। 20 वर्षीय हरीश चंडीगढ़ में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए और गंभीर ब्रेन इंजरी के कारण 'परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट' (PVS) में चले गए।
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तीन भाई-बहनों में सबसे बड़े हरीश के लिए पिता ने अपनी पूरी संपत्ति और मकान तक बेच दिया, ताकि बेटे का इलाज हो सके। 13 वर्षों तक परिवार ने एक नवजात शिशु की तरह उनकी सेवा की, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ।

जब चिकित्सा विज्ञान ने हाथ खड़े कर दिए, तब परिवार ने कानूनी लड़ाई शुरू की। साल 2024-25 में दिल्ली हाईकोर्ट से राहत न मिलने पर परिवार सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। मेडिकल बोर्ड ने माना कि हरीश के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है।

11 मार्च 2026 को जस्टिस जेबी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन की बेंच ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए भारत में पहली बार 'पैसिव यूथेनेशिया' (फीडिंग ट्यूब हटाने) की अनुमति दी।
24 मार्च 2026 को एम्स के पैलिएटिव केयर यूनिट में प्रोटोकॉल के तहत उपचार बंद करने के बाद हरीश सदा के लिए शांत हो गए।

हरीश की विदाई के पल अत्यंत भावुक थे। 15 मार्च को जब उन्हें गाजियाबाद स्थित घर से एम्स ले जाया जा रहा था, तब उनकी मां ने उनके कान में कहा था - "सबको माफ करते हुए, सबसे माफी मांगते हुए, सो जाओ…।" ब्रह्माकुमारी बहनों ने भी उन्हें घर पर भावपूर्ण विदाई दी थी।

हरीश के निधन की खबर मिलते ही हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के जयसिंहपुर की सरी पंचायत के प्लेटा गांव में सन्नाटा पसर गया है। ग्रामीण बताते हैं कि कोरोना काल में भी परिवार हरीश को लेकर गांव आया था, लेकिन वह मासूम बिस्तर से नहीं उठ सका।
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पूर्व सदस्य खुशी राम भूरिया ने दुख जताते हुए कहा कि परिवार ने बेटे को बचाने के लिए कड़ा संघर्ष किया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। आज पूरा गांव अपने उस बेटे के लिए गमगीन है, जिसने मौत से लंबी जंग लड़ी और अंततः कानून के जरिए सुकून पाया।