मेरठ के ऐतिहासिक औघड़नाथ मंदिर में शिवलिंग पर चढ़ाए गए जल से बुझ रही धरती की प्यास
ऐतिहासिक औघड़नाथ मंदिर के प्रांगण में हर सुबह शिवलिंग पर जल चढ़ाया जाता है। लेकिन यहां की खास बात यह है कि यह जल यूं ही बहकर व्यर्थ नहीं जाता। ...और पढ़ें
Publish Date: Sun, 22 Mar 2026 04:29:19 PM (IST)Updated Date: Sun, 22 Mar 2026 06:28:31 PM (IST)
HighLights
- जल यूं ही बहकर व्यर्थ नहीं जाता है
- दो रेन वाटर हार्वेस्टिंग पिट बनाए गए हैं
- 40 लाख लीटर जल धरती में समा जाता है
डिजिटल डेस्क। धूप से तपती धरती जैसे हर दिन आसमान की ओर देखती मानो पूछ रही हो, मेरी प्यास कब बुझेगी? और तभी, शहर के एक कोने में, घंटियों की मधुर ध्वनि के बीच एक ऐसा दृश्य जन्म लेता है, जहां आस्था सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि प्रकृति की सेवा बन जाती है।
ऐतिहासिक औघड़नाथ मंदिर के प्रांगण में हर सुबह शिवलिंग पर जल चढ़ाया जाता है। श्रद्धालु अपने हाथों से जल अर्पित करते हैं, यह मानकर कि यह उनकी भक्ति का प्रतीक है। लेकिन यहां की खास बात यह है कि यह जल यूं ही बहकर व्यर्थ नहीं जाता। मंदिर ने एक अनोखी पहल की है जहां हर बूंद को सहेजकर धरती मां तक पहुंचाया जाता है।
दो विशेष रेन वाटर हार्वेस्टिंग पिट बनाए गए हैं
मंदिर के विशाल परिसर में, पत्थरों से सजे फर्श और ऊंचे शिखरों के बीच, दो विशेष रेन वाटर हार्वेस्टिंग पिट बनाए गए हैं। जब बारिश होती है या शिवलिंग पर अभिषेक किया जाता है, तो यह जल इन पिटों के माध्यम से फिल्टर होकर धीरे-धीरे जमीन के अंदर, करीब 100 फीट गहराई तक पहुंच जाता है।
मानो हर बूंद अपनी यात्रा पूरी कर रही हो आसमान से धरती तक, और फिर धरती के गर्भ में समाकर उसे जीवन दे रही हो।
40 लाख लीटर जल इस प्रक्रिया से धरती में समा जाता है
कहते हैं कि साल भर में करीब 40 लाख लीटर जल इस प्रक्रिया से धरती में समा जाता है। बारिश के दिनों में लगभग 20 लाख लीटर और शिवरात्रि जैसे पावन अवसरों पर अर्पित जल भी इसी तरह संरक्षित होता है। यह सिर्फ एक तकनीकी व्यवस्था नहीं, बल्कि सोच का परिवर्तन है जहां धर्म और विज्ञान एक साथ मिलकर पर्यावरण की रक्षा कर रहे हैं।
इसी सोच की एक और झलक बुढ़ाना गेट स्थित धर्मेश्वर महादेव मंदिर में भी देखने को मिलती है। यहां भी जलाभिषेक का पानी व्यर्थ नहीं जाता, बल्कि विशेष पिट और फिल्टर के जरिए जमीन के भीतर पहुंचाया जाता है। यहां तक कि कुंड में भरा गया पानी भी अंततः धरती को ही समर्पित हो जाता है।
जहां आस्था, जिम्मेदारी बन जाती है
यह कहानी सिर्फ मंदिरों की नहीं है, बल्कि उस नई दिशा की है जहां आस्था, जिम्मेदारी बन जाती है। जहां पूजा केवल ईश्वर के लिए नहीं, बल्कि प्रकृति के लिए भी होती है।
और शायद यही असली अभिषेक है जब शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल, अंततः धरती मां की प्यास बुझाता है।