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डिजिटल डेस्क। आज जब 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के तहत अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है, तो दुनिया को 50 साल पुराना वो मंजर याद आ रहा है जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था की बुनियाद हिला दी थी। होर्मुज स्ट्रेट में मंडराता संकट और $100 के पार जाता कच्चा तेल, 1973 के उस ऐतिहासिक 'ऑयल शॉक' की परछाई जैसा लग रहा है।

6 अक्टूबर 1973 को मिस्र और सीरिया ने इजरायल पर अचानक हमला कर दिया। यह हमला 1967 के '6-दिवसीय युद्ध' में खोई हुई अपनी जमीन और सम्मान वापस पाने की एक कोशिश थी।

अपनी सैन्य हार से बौखलाए अरब देशों (OPEC) ने युद्ध के मैदान के बाहर एक ऐसा हमला किया जिसकी कल्पना पश्चिमी देशों ने नहीं की थी। 17 अक्टूबर 1973 को सऊदी अरब के नेतृत्व में तेल प्रतिबंध (Oil Embargo) की घोषणा कर दी गई।
निशाना: अमेरिका और इजरायल का साथ देने वाले यूरोपीय देश।
मकसद: पश्चिमी ताकतों को इजरायल का समर्थन छोड़ने पर मजबूर करना।

तेल प्रतिबंध लगते ही पूरी दुनिया में हाहाकार मच गया।
कीमतों में आग: जुलाई 1973 में जो तेल $2.80 प्रति बैरल था, वह दिसंबर तक $11.65 के पार पहुंच गया। महज कुछ महीनों में कीमतें 400% बढ़ गईं।
सड़कों पर सन्नाटा: अमेरिका और यूरोप के पेट्रोल पंपों पर मीलों लंबी कतारें लगने लगीं। कई देशों में 'संडे ड्राइविंग' पर रोक लगा दी गई और बिजली बचाने के लिए ऑफिस जल्दी बंद होने लगे।
आर्थिक मंदी: इस संकट ने 'स्टैगफ्लेशन' (Stagflation) को जन्म दिया - ऐसी स्थिति जहां महंगाई चरम पर थी लेकिन विकास दर शून्य हो गई थी।

1973 के संकट ने दुनिया को हमेशा के लिए बदल दिया...
आज ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट (जहां से दुनिया का 20% तेल गुजरता है) को ब्लॉक करने की धमकी 1973 की याद दिलाती है। फर्क सिर्फ इतना है कि आज दुनिया के पास विकल्प ज्यादा हैं, लेकिन तेल पर निर्भरता आज भी किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को तबाह करने के लिए काफी है।
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