
डिजिटल डेस्क। यूरोप इस समय एक गंभीर नशीली दवाओं के संकट से जूझ रहा है, और इसकी जड़ें सीधे तौर पर चीन से जुड़ी हैं। यूरोपोल (Europol) की हालिया रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि चीन से आने वाले 'काले केमिकल्स' (Precursor Chemicals) अब यूरोप की सड़कों पर जहर घोल रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका में डोनल्ड ट्रंप के सत्ता में आने और ड्रग्स पर सख्ती बरतने के बाद, चीनी ड्रग सिंडिकेट्स ने अपना पूरा ध्यान अब यूरोपीय बाजारों की ओर मोड़ दिया है।
चीन में इन रसायनों का निर्माण और बिक्री आश्चर्यजनक रूप से आसान है। यहां के बाजारों से ये केमिकल्स खुलेआम खरीदे जा सकते हैं। कस्टम जांच से बचने के लिए इन रसायनों को इलेक्ट्रॉनिक सामानों के साथ बड़े कंटेनरों में छिपाकर यूरोप भेजा जाता है। फर्जी दस्तावेजों और कूटनीतिक खामियों का फायदा उठाकर ये शिपमेंट यूरोप के बंदरगाहों तक पहुंचते हैं। वहां से ट्रेनों के जरिए इन्हें नीदरलैंड, बेल्जियम, पोलैंड और चेक रिपब्लिक जैसे देशों की गुप्त इंडस्ट्रियल लैब्स में भेजा जाता है।
यूरोपीय एजेंसियों के अनुसार, न केवल केमिकल बल्कि पूरी की पूरी ड्रग्स बनाने वाली मशीनरी भी चीन से तस्करी कर लाई गई है। नीदरलैंड वर्तमान में इस काले कारोबार का मुख्य केंद्र (Hub) बना हुआ है, जहां इन रसायनों को मेथ (Meth) और एक्स्टसी (Ecstasy) जैसे खतरनाक ड्रग्स में बदला जाता है। हाल ही में हुई छापेमारी में यूरोपोल ने 24 लैब्स को सील किया और 1000 टन से ज्यादा केमिकल जब्त किया है।
यह भी पढ़ें- शक्तिशाली सेनाओं की नई लिस्ट जारी... चीन तीसरे स्थान पर स्थिर, पाकिस्तान टॉप-10 से बाहर, भारत किस नंबर पर
लंदन स्थित एक थिंक टैंक का दावा है कि चीनी एजेंसियां इस अवैध व्यापार पर लगाम लगाने के बजाय इसे मौन समर्थन दे रही हैं। आंकड़ों के मुताबिक, यूरोप में पिछले साल लगभग 2 करोड़ लोगों ने एमडीएमए (MDMA) का सेवन किया। यूरोप में इस सिंथेटिक ड्रग मार्केट की कीमत 1.5 अरब पाउंड (लगभग 18,823 करोड़ रुपये) आंकी गई है। यह स्थिति न केवल स्वास्थ्य संकट है, बल्कि यूरोप की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गई है।