
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। मशहूर निवेशक और दुनिया के शीर्ष अरबपतियों में शुमार वॉरेन बफे के सेवानिवृत्त होने के पश्चात उनके 71 वर्षीय सुपुत्र हॉवर्ड बफे को बर्कशायर हैथवे का नया चेयरमैन नियुक्त किया गया है। हालांकि, संस्थान के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) के रूप में दैनिक संचालन और व्यावसायिक गतिविधियों की कमान ग्रेगरी एबेल ही संभाल रहे हैं। अकूत संपत्ति और व्यावसायिक साम्राज्य के उत्तराधिकारी होने के बावजूद हॉवर्ड का जीवन आम कॉर्पोरेट दिग्गजों की तुलना में बेहद साधारण और लीक से हटकर रहा है।
तीन भाई-बहनों में दूसरे स्थान पर आने वाले हॉवर्ड को अपने बचपन के दिनों में पिता की विशाल संपत्ति का ज़रा भी अहसास नहीं था। स्कूली शिक्षा के दौरान जब अध्यापकों ने उनके पिता के व्यवसाय के बारे में पूछा, तो हॉवर्ड और उनकी बहन सुसान ने सहजता से जवाब दिया कि उनके पिता सिक्योरिटी गार्ड का काम करते हैं। उन्हें वर्षों बाद जाकर यह समझ आया कि उनके पिता वैश्विक वित्तीय जगत की कितनी बड़ी हस्ती हैं।
वर्ष 1973 में हाईस्कूल पूरा करने के उपरांत जब हॉवर्ड ने नई कार खरीदने की इच्छा जताई, तब वॉरेन बफे ने उनके सामने एक व्यावहारिक शर्त रखी। तय सौदे के अनुसार, हॉवर्ड ने आने वाले तीन वर्षों तक जन्मदिन, क्रिसमस और दीक्षांत समारोह जैसे अवसरों पर मिलने वाले उपहारों के बदले 5,000 डॉलर की राशि अग्रिम ली। कार का मूल्य अधिक होने के कारण उन्होंने शेष 2,300 डॉलर का प्रबंध स्वयं मेहनत करके किया और तब जाकर वाहन खरीदा।
व्यावसायिक पृष्ठभूमि के बावजूद हॉवर्ड का मुख्य झुकाव हमेशा से कृषि और प्रकृति की ओर रहा। उन्होंने अपने पारिवारिक घर के पिछले हिस्से को खेत का रूप दे दिया था। उच्च शिक्षा के दौरान उन्होंने एक बुलडोजर खरीदकर भूमि समतल करने और बेसमेंट निर्माण जैसी व्यावसायिक गतिविधियों में हाथ आजमाया। बाद में उन्होंने वृहद स्तर पर लगभग 1,500 एकड़ भूमि पर स्वयं खेती की। इसके साथ ही उन्हें वन्यजीव फोटोग्राफी का भी गहरा शौक रहा है।
हॉवर्ड का जीवन साहसिक घटनाओं से भरा रहा है। सितंबर 1997 में कनाडा के हडसन बे क्षेत्र में वन्यजीवों की तस्वीरें लेते समय एक भालू ने उन पर हमला कर दिया था, जहाँ सही समय पर पहुँचे हेलीकॉप्टर की मदद से उनकी जान बचाई जा सकी। इसी प्रकार वर्ष 2012 में जब कांगो का गोमा शहर विद्रोहियों के नियंत्रण में चला गया, तब हॉवर्ड ने महज 48 घंटों के भीतर स्थानीय अस्पतालों में जलापूर्ति और बिजली जनरेटरों की व्यवस्था कराकर कई लोगों का जीवन सुरक्षित किया।
वर्ष 1999 से वे निरंतर जनकल्याणकारी कार्यों में लगे हुए हैं। उनके धर्मार्थ संगठन ने विश्वभर में भलाई के कार्यों पर अब तक लगभग 38,000 करोड़ रुपये का योगदान दिया है, और वे अपने वैश्विक अभियानों के सिलसिले में 150 से अधिक देशों की यात्रा कर चुके हैं।