_m.webp)
डिजिटल डेस्क। क्या मौत के बाद फिर से जिंदा होना संभव है? विज्ञान अभी इसका जवाब नहीं दे पाया है, लेकिन दुनिया के कुछ लोग इस उम्मीद पर दांव लगा रहे हैं। वे अपने शरीर या सिर्फ दिमाग को बेहद ठंडे तापमान पर संरक्षित करवा रहे हैं, ताकि भविष्य में जब तकनीक आगे बढ़े, तो उन्हें दोबारा जीवित किया जा सके। इस प्रक्रिया को Cryonics कहा जाता है।
मौत नहीं, एक ‘पॉज’ मानते हैं लोग
क्रायोनिक्स को अपनाने वाले लोग मौत को अंत नहीं, बल्कि एक अस्थायी ठहराव मानते हैं। उनका मानना है कि आने वाले समय में विज्ञान इतनी तरक्की कर सकता है कि आज जिन बीमारियों या मौत को अंतिम माना जाता है, उनका इलाज संभव हो जाए। हालांकि आलोचक इसे महज एक महंगा और अव्यावहारिक सपना बताते हैं।
कैसे किया जाता है शरीर को संरक्षित?
इस प्रक्रिया में शरीर को -196 डिग्री सेल्सियस पर तरल नाइट्रोजन में रखा जाता है। इससे पहले शरीर में मौजूद खून को निकालकर उसकी जगह खास केमिकल (क्रायो-प्रोटेक्टेंट) डाले जाते हैं, ताकि कोशिकाओं में बर्फ न जमे। इसके बाद शरीर को ‘विट्रिफिकेशन’ यानी कांच जैसी अवस्था में सुरक्षित किया जाता है।
दुनिया में कहां होती है यह प्रक्रिया?
इस क्षेत्र में दो प्रमुख संस्थाएं काम कर रही हैं Alcor Life Extension Foundation (एरिजोना) और Cryonics Institute (मिशिगन)। यहां दुनिया भर के लोग अपने शरीर को संरक्षित करवा रहे हैं। 2026 तक 500 से ज्यादा लोग इस प्रक्रिया से गुजर चुके हैं, जबकि हजारों लोग पहले से पंजीकरण करा चुके हैं।
सिर्फ दिमाग भी करवा सकते हैं संरक्षित
कई लोग पूरे शरीर की बजाय सिर्फ दिमाग को संरक्षित कराना पसंद करते हैं, जिसे न्यूरो-प्रिजर्वेशन कहा जाता है। माना जाता है कि इंसान की यादें, सोच और पहचान दिमाग में ही होती हैं। भविष्य में नैनोटेक्नोलॉजी या डिजिटल सिस्टम के जरिए इन्हें फिर से सक्रिय करने की संभावना जताई जाती है।
कितना आता है खर्च?
पूरे शरीर को संरक्षित कराने में करीब 1.5 से 2 करोड़ रुपये तक खर्च आता है, जबकि सिर्फ दिमाग के लिए 60-70 लाख रुपये लगते हैं। इतनी बड़ी रकम के लिए लोग अक्सर जीवन बीमा का सहारा लेते हैं, जिससे यह खर्च भविष्य में कवर हो सके।
सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती कोशिकाओं और ऊतकों को नुकसान से बचाना है, खासकर दिमाग जैसे जटिल अंग में। अभी तक किसी भी संरक्षित व्यक्ति को दोबारा जीवित नहीं किया जा सका है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि स्टेम सेल, नैनो-रोबोट्स और एडवांस मेडिकल टेक्नोलॉजी भविष्य में इस दिशा में रास्ता खोल सकती है।
1967 से शुरू हुआ सफर
क्रायोनिक्स कोई नई तकनीक नहीं है। 1967 में James Bedford पहले व्यक्ति बने जिन्हें इस तरीके से संरक्षित किया गया था। आज भी उनका शरीर अमेरिका में सुरक्षित रखा गया है। समय के साथ तकनीक में सुधार हुआ है, लेकिन ‘पुनर्जीवन’ अभी भी एक अधूरा सपना है।